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खाकी का अहंकार या सच का डर? लहूलुहान युवती पर खबर का सच इंस्पेक्टर को लगा ‘मिर्ची’, पत्रकारों को ‘अज्ञानी’ बताकर की तानाशाही!

खाकी का अहंकार या सच का डर? लहूलुहान युवती पर खबर का सच इंस्पेक्टर को लगा ‘मिर्ची’, पत्रकारों को ‘अज्ञानी’ बताकर की तानाशाही!

लोनार थाने के इंस्पेक्टर राकेश यादव की कार्यशैली पर उठे सवाल; खबर लिखने पर पत्रकारों को डिजिटल वालंटियर ग्रुप से निकाला।

हरदोई (लोनार): उत्तर प्रदेश पुलिस की छवि को ‘फ्रेंडली’ बनाने के सरकारी दावों की हवा, लोनार थाने के इंस्पेक्टर राकेश यादव की कथित ‘तानाशाही’ ने निकाल दी है। खबर से बौखलाए इंस्पेक्टर ने न केवल पत्रकारों को ‘अज्ञानी’ करार दिया, बल्कि डिजिटल वालंटियर ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखाकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी ताक पर रख दिया।

क्या है पूरा मामला?

घटना बावन चौराहे के पास की है, जहाँ गुरुवार को राहगीरों ने एक युवती को मरणासन्न और लहूलुहान हालत में देखा। युवती के चेहरे पर गंभीर चोटें और अस्त-व्यस्त कपड़े इस बात की गवाही दे रहे थे कि यह कोई साधारण घटना नहीं है। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मौके की नजाकत को भांपते हुए निष्पक्ष खबर चलाई और दुष्कर्म जैसी गंभीर आशंका जताई।

इंस्पेक्टर का ‘अहंकारी’ रवैया

मीडिया द्वारा सच का आईना दिखाया जाना इंस्पेक्टर राकेश यादव को नागवार गुजरा। युवती को न्याय दिलाने और अपराधियों की तलाश करने के बजाय, इंस्पेक्टर ने अपनी ऊर्जा पत्रकारों को नीचा दिखाने में लगा दी। शुक्रवार को डिजिटल वालंटियर ग्रुप में उन्होंने मर्यादाओं की सीमा लांघते हुए लिखा- “अज्ञानी मित्र से अच्छा ज्ञानी शत्रु होता है।” सीधे तौर पर उन्होंने उन पत्रकारों को अपमानित किया, जो स्थानीय अपराधों और पुलिस की उपलब्धियों को जनता तक पहुँचाते रहे हैं।

विवादों से पुराना नाता

यह पहली बार नहीं है जब राकेश यादव सुर्खियों में हैं। सांडी थाने में तैनाती के दौरान भी पत्रकारों के साथ अभद्रता और विवाद के चलते उनका स्थानांतरण किया गया था। लोनार में भी आते ही उन्होंने एक पत्रकार को अपशब्द कहे, और जब मामला तूल पकड़ा तो कथित तौर पर फर्जी शिकायत दर्ज करवाकर पत्रकार को ही निशाना बनाया।

पत्रकारों में आक्रोश, उच्चाधिकारियों से शिकायत की तैयारी

इंस्पेक्टर की इस मनमानी और तानाशाही के खिलाफ स्थानीय पत्रकारों ने मोर्चा खोल दिया है। पत्रकारों का कहना है कि वे ऐसी पत्रकारिता के पक्षधर नहीं हैं जो सिर्फ पुलिस की ‘वाह-वाही’ करे। इस पूरे प्रकरण की शिकायत शासन और प्रशासन के उच्च अधिकारियों से करने का निर्णय लिया गया है।

अब देखना यह है कि ‘खाकी का अहंकार’ क्या सच की आवाज को दबा पाएगा, या उच्चाधिकारी इस ‘तानाशाही’ पर लगाम लगाएंगे?

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