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जखनियां/गाजीपुर : वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल, जाम में फंसी एंबुलेंस और सार्वजनिक व्यवहार पर मंथन जरूरी

वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल, जाम में फंसी एंबुलेंस और सार्वजनिक व्यवहार पर मंथन जरूरी

जखनियां/गाजीपुर। क्षेत्राधिकारी रामकृष्ण तिवारी से संबंधित एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद तरह-तरह की चर्चाएं और प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। वीडियो को लेकर लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से टिप्पणी कर रहे हैं और घटना के विभिन्न पहलुओं को लेकर मत व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि किसी भी वायरल वीडियो के आधार पर तत्काल निष्कर्ष निकालने के बजाय घटना के दोनों पक्षों को समझना और पूरे घटनाक्रम का सामाजिक दृष्टिकोण से मूल्यांकन करना अधिक उचित होगा।इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जाम में फंसी एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाओं के प्रति आम नागरिकों की जिम्मेदारी को लेकर सामने आता है। यदि किसी स्थान पर एंबुलेंस जाम में फंसी हो और पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचकर रास्ता सुचारू कराने का प्रयास कर रहे हों, तो ऐसी स्थिति में प्रत्येक नागरिक का दायित्व बनता है कि वह सहयोग करे और सबसे पहले एंबुलेंस को रास्ता देने का प्रयास करे।

पहला सवाल—क्या जाम की समस्या हमारे लिए इतनी सामान्य हो गई है?

घटना के संदर्भ में यह सवाल विचारणीय है कि मौके पर मौजूद लोगों को जाम की समस्या की आदत इस कदर कैसे हो गई कि उन्हें जाम में फंसी एंबुलेंस और वहां मौजूद पुलिसकर्मी तक सहज रूप से दिखाई नहीं दिए। एंबुलेंस किसी सामान्य वाहन की तरह नहीं होती। उसमें किसी मरीज की जिंदगी दांव पर हो सकती है और उसके लिए प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण होता है।पुलिस, फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस जैसी सेवाओं को आपातकालीन परिस्थितियों में तत्काल सहायता पहुंचाने वाली सेवाओं के रूप में देखा जाता है। इसलिए इनके रास्ते में आने वाली बाधा को केवल यातायात की सामान्य समस्या मानना उचित नहीं है।

दूसरा सवाल—बहस के दौरान भाषा और व्यवहार की मर्यादा कहां तक उचित?

वायरल वीडियो में बातचीत के दौरान जिस प्रकार की भाषा और व्यवहार दिखाई देने की चर्चा हो रही है, वह भी सामाजिक मंथन का विषय है। किसी भी विवाद की स्थिति में असहमति हो सकती है, सवाल पूछे जा सकते हैं और अपनी बात रखने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है, लेकिन क्या अपनी बात रखने के लिए विनम्रता और मर्यादा की सीमा को बनाए रखना आवश्यक नहीं है?
विशेष रूप से जब सामने पुलिस अधिकारी अथवा कोई अन्य सार्वजनिक सेवा से जुड़ा अधिकारी मौजूद हो और मामला तत्काल यातायात व्यवस्था तथा एंबुलेंस को रास्ता दिलाने से जुड़ा हो, तब बातचीत का तरीका और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दिखाई देने वाले कुछ क्षणों के आधार पर किसी व्यक्ति के पूरे व्यवहार अथवा घटना के प्रारंभिक पक्ष के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वीडियो से पहले क्या हुआ, बातचीत किस परिस्थिति में शुरू हुई और दोनों पक्षों के बीच किस क्रम में संवाद हुआ—इन सभी पहलुओं को समझना आवश्यक है।

तीसरा सवाल—जब अधिकारी मौके पर मौजूद थे तो सहयोग क्यों नहीं?

घटना के दौरान चौकी प्रभारी/उपनिरीक्षक, प्रभारी निरीक्षक तथा अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ क्षेत्राधिकारी की मौजूदगी का भी उल्लेख किया जा रहा है। ऐसे में मूल प्रश्न यह था कि सड़क पर ऑटो और बोलेरो जैसे वाहन किस कारण से खड़े हैं और उनके कारण घर के सामने तथा सड़क पर यातायात प्रभावित होकर जाम की स्थिति क्यों उत्पन्न हो रही है।यदि सड़क पर वाहनों के खड़े होने से एंबुलेंस को निकलने में परेशानी हो रही थी तो ऐसी स्थिति में विवाद बढ़ाने के बजाय समस्या का तत्काल समाधान करना ही सभी पक्षों के हित में होता। किसका वाहन है, कौन सही है और कौन गलत—इन सवालों से पहले एंबुलेंस को रास्ता मिलना जरूरी था।

सवाल पुलिस से भी, समाज से भी

इस पूरे प्रकरण को केवल पुलिस बनाम आम जनता के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह घटना समाज के सामने भी एक महत्वपूर्ण सवाल रखती है कि आपातकालीन स्थिति में हमारा सामूहिक व्यवहार कैसा होना चाहिए?यदि किसी सड़क पर एंबुलेंस फंसी हो, पुलिसकर्मी यातायात व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहे हों और फिर भी लोग बहस अथवा विवाद में उलझे रहें, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का विषय बन जाता है।वहीं पुलिस अधिकारियों से भी जनता की अपेक्षा रहती है कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए संवाद में संयम, शालीनता और पारदर्शिता बनाए रखें। इसी प्रकार आम नागरिकों से भी अपेक्षा है कि वे अपनी बात रखते समय कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें और आपातकालीन सेवाओं के महत्व को समझें।

वायरल वीडियो से ज्यादा जरूरी है उससे मिलने वाला संदेश

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होना आज के समय में सामान्य बात है, लेकिन किसी घटना के कुछ सेकंड के वीडियो को देखकर किसी व्यक्ति अथवा पूरे समाज के बारे में धारणा बना लेना उचित नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि घटना के सभी पहलुओं को समझा जाए और उससे मिलने वाले सामाजिक संदेश पर विचार किया जाए।एंबुलेंस को रास्ता देना किसी अधिकारी या पुलिस का उपकार नहीं, बल्कि मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी है। इसी प्रकार पुलिसकर्मियों का भी दायित्व है कि वे कानून का पालन कराने के साथ जनता के साथ संवाद में मर्यादा और संवेदनशीलता बनाए रखें।अंततः यह घटना हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय है। यदि समाज आपातकालीन सेवाओं की मौजूदगी के बावजूद विवाद, बहस और असहयोग को सामान्य मानने लगे तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। इसलिए वायरल वीडियो को लेकर किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध से आगे बढ़कर हमें यह विचार करना चाहिए कि सड़क पर फंसी एंबुलेंस को सबसे पहले रास्ता कैसे मिले और ऐसी परिस्थितियों में समाज तथा प्रशासन दोनों का व्यवहार कैसा होना चाहिए।यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश हो सकता है।

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