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हिन्दू धर्म ग्रन्थों को संजोकर भारतीय भाषाओं में घर घर पहुंचाने का श्रेय गीता प्रेस को जाता है: पारसनाथ राय

हिन्दू धर्म ग्रन्थों को संजोकर भारतीय भाषाओं में घर घर पहुंचाने का श्रेय गीता प्रेस को जाता है: पारसनाथ राय

गीता प्रेस की स्थापना 29 अप्रैल 1923 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में हुई। आज यह संस्थान 103वर्ष की यात्रा पूरी कर अत्याधुनिक तकनीक सम्पन्न संस्थान के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा है।इसके प्रमुख संस्थापक जयदयाल गोयन्दका, हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी) और घनश्याम दास जालान थे। श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और अन्य हिन्दू धर्मग्रंथों को अत्यंत कम मूल्य पर जनसामान्य तक पहुँचाना इसका मूल उद्देश्य रहा है। गीता प्रेस को हिन्दू धार्मिक साहित्य का विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशक माना जाता है। इसने करोड़ों प्रतियों में धार्मिक ग्रंथ प्रकाशित किए हैं। यह प्रतिष्ठान अपने आप में अद्भुत है। आज यदि भारत वर्ष के घर घर में रामचरित मानस, हनुमान चालीसा पाया जाता है तो यह गीता प्रेस की ही देन है। धार्मिक पुस्तकों को बिना विज्ञापन के यहां विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित किया जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि धार्मिक पुस्तकों को छाप कर भारतीय मूल्य,परम्परा एवम् संस्कृति बीजारोपण का यह अनुपम प्रयास कर रहा है। उक्त बातें गीता प्रेस गोरखपुर के आग्रह पर संस्था में पहुंचे पुराने स्वयंसेवक एवम् भारतीय जनता पार्टी गाजीपुर के वरिष्ठ नेता पारसनाथ राय ने कही। पारसनाथ राय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गीता प्रेस देखने की इच्छा व्यक्त की और शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम में लगभग चालीस मिनट तक संग्रहीत चित्रों एवम् दुर्लभ पांडुलिपियों को निहारा। इस अवसर पर एनटीपीसी की सीएमडी तथा अंग्रेजी के प्रो.डॉ सन्तोष कुमार मिश्र एवम् कुशल त्रिपाठी आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

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