रक्षाबन्धन : स्नेह, संस्कार और संरक्षण का सनातन उत्सव

रक्षाबन्धन : स्नेह, संस्कार और संरक्षण का सनातन उत्सव
रक्षाबन्धन भारतीय संस्कृति की उस सनातन संवेदना का पावन पर्व है, जहाँ भगिनी का निष्कलुष स्नेह रक्षा-सूत्र बनकर भ्राता की कलाई पर सुशोभित होता है और भ्राता उसी स्नेह से आबद्ध होकर भगिनी की गरिमा, मर्यादा, स्वाभिमान तथा सम्मान के संरक्षण के प्रति आजीवन कृतसंकल्प होता है। यह सूक्ष्म सूत्र केवल दो कलाइयों को नहीं, दो हृदयों को विश्वास, आत्मीयता और अटूट उत्तरदायित्व के चिरन्तन बन्धन में आबद्ध करता है। यहाँ स्नेह संकल्प का रूप लेता है, आत्मीयता कर्तव्य में परिणत होती है और संरक्षण की भावना परिवार की सीमा लाँघकर समाज, राष्ट्र तथा समस्त सृष्टि के मंगल तक विस्तृत हो जाती है।
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंगलमय मन्त्र में निहित भाव भारतीय संस्कृति की उस उदात्त दृष्टि का परिचायक है, जहाँ सम्बन्ध केवल रक्त से नहीं, हृदय की पवित्रता से सार्थक होते हैं। रक्षा-सूत्र वस्तुतः सूत का तन्तु नहीं, अपितु विश्वास, मर्यादा, स्नेह और कर्तव्यचेतना से निर्मित वह अदृश्य सूत्र है, जो जीवन को आत्मीय सम्बन्धों की गरिमा से जोड़ता है। हमारे पर्व केवल कालानुक्रमिक उत्सव नहीं; वे संस्कारों के संवाहक, स्मृतियों के संरक्षक और पीढ़ियों को अपनी मूल चेतना से जोड़ने वाले चिरन्तन सेतु हैं।
भगिनी जब भ्राता की कलाई पर यह सूत्र बाँधती है, तब उसके अन्तःकरण से मंगल, दीर्घायु और सद्बुद्धि की कामना प्रस्फुटित होती है; भ्राता के हृदय में उसके प्रति स्नेह, सम्मान और उत्तरदायित्व का संकल्प जाग्रत होता है। भारतीय मनीषा ने नारी को कभी दुर्बलता का प्रतीक नहीं माना। वह शक्ति, प्रज्ञा, धैर्य, करुणा, सृजन और संस्कार की अधिष्ठात्री है। उसकी सहज कोमलता उसकी निर्बलता नहीं, बल्कि अन्तर्निहित सामर्थ्य की सौम्य अभिव्यक्ति है। अतः नारी की प्रतिष्ठा और गरिमा की रक्षा किसी कृपा का विषय नहीं, बल्कि सभ्य और संस्कारित समाज का स्वाभाविक धर्म है।
रक्षाबन्धन का संदेश पारिवारिक स्नेह से आरम्भ होकर समष्टिगत उत्तरदायित्व तक पहुँचता है। यह हमें प्रेरित करता है कि धर्म की मर्यादा अक्षुण्ण रहे, संस्कृति की गरिमा सुरक्षित रहे, राष्ट्र की अखण्डता सुदृढ़ रहे और प्रकृति का संतुलन अविच्छिन्न बना रहे। नदियाँ, सरिताएँ, सरोवर, वन, पर्वत, भूमि और जीवनदायिनी प्रकृति ये सब हमारे अस्तित्व की आधारभूमि हैं; इनके संरक्षण में ही भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी वास्तविक निष्ठा निहित है।
श्रावण पूर्णिमा का यह पवित्र दिवस ऋषि-परम्परा, आचार्य-चेतना और महापुरुषों की लोकमंगलकारी दृष्टि का स्मरण कराता है। भारतीय दर्शन ने मनुष्य के जीवन को सदैव व्यापक बनाया है व्यक्ति से कुटुम्ब, कुटुम्ब से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से सम्पूर्ण चराचर जगत् तक। “सर्वभूतहिते रताः” की भावना इसी विराट जीवन-दृष्टि का सार है, जहाँ अपना मंगल तभी पूर्ण माना जाता है, जब उसमें सबके कल्याण की कामना समाहित हो।
आज आवश्यकता है कि रक्षा-सूत्र केवल कलाई पर शोभित न हो, बल्कि विचार में विवेक, व्यवहार में मर्यादा और जीवन में कर्तव्यनिष्ठा बनकर प्रतिष्ठित हो। हम अपनी माताओं और भगिनियों की गरिमा के प्रति सजग रहें, परिवार में स्नेह और संस्कारों को पुष्ट करें, समाज में समरसता का संवर्धन करें, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता रखें तथा राष्ट्र और धर्म के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन करें।
रक्षाबन्धन की वास्तविक महिमा इसी में है कि एक कोमल-सा रक्षा-सूत्र मनुष्य को अपने से परे देखने की दृष्टि देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रेम अधिकार नहीं, समर्पण है; सम्बन्ध अपेक्षा नहीं, उत्तरदायित्व हैं; और संरक्षण केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, समस्त जीवन-मूल्यों का होना चाहिए। यही इस पर्व की सनातन सार्थकता और भारतीय संस्कृति की उदात्त जीवन-दृष्टि है।
इस पावन श्रावणी पर्व पर प्रत्येक हृदय में स्नेह और सद्भाव, प्रत्येक परिवार में संस्कार और आत्मीयता, प्रत्येक समाज में समरसता और बन्धुत्व तथा सम्पूर्ण राष्ट्र में धर्म, संस्कृति और लोकमंगल की चेतना अखण्ड रूप से प्रज्वलित रहे इसी मंगलभावना के साथ रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥
हरिः ॐ 🚩
युवा🌹🌹



