निष्ठा, अनदेखी और अब ‘हाथी’ की सवारी: अस्मिता चंद के बसपा में जाने से चिल्लूपार का सियासी गणित बदला

निष्ठा, अनदेखी और अब ‘हाथी’ की सवारी: अस्मिता चंद के बसपा में जाने से चिल्लूपार का सियासी गणित बदला

गोरखपुर के चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में निष्ठा और महत्वाकांक्षा के बीच जारी खींचतान ने एक नया मोड़ ले लिया है। वर्षों तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की समर्पित सिपाही और महिला मोर्चा की प्रांतीय पदाधिकारी रहीं अस्मिता चंद का आखिरकार सब्र टूट गया। लगातार उपेक्षा से आहत होकर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थाम लिया है। चर्चा है कि बसपा उन्हें चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाने जा रही है।
आइए उन तीन बड़े राजनीतिक पड़ावों पर नज़र डालते हैं, जहाँ मजबूत ज़मीनी पकड़ के बावजूद भाजपा में रहते हुए उनकी दावेदारी अंतिम वक्त पर सिमट कर रह गई:
1. जिला पंचायत अध्यक्ष: होर्डिंग्स लगे, तैयारी पूरी थी… फिर आया ‘आलाकमान’ का फरमान
जिला पंचायत चुनाव में अस्मिता चंद एक बेहद मजबूत दावेदार के रूप में उभरी थीं। क्षेत्र में उनका जनाधार ऐसा था कि जीत के दावे के साथ पूरे इलाके में उनके बड़े-बड़े होर्डिंग्स और पोस्टर्स लग चुके थे। समर्थकों में भारी उत्साह था, लेकिन ऐन वक्त पर ‘शीर्ष नेतृत्व’ के एक निर्देश ने बाजी पलट दी। पार्टी के निर्देश पर उन्हें पीछे हटना पड़ा, जिससे समर्थकों को भारी निराशा हुई। पार्टी अनुशासन के खातिर तब उन्होंने मौन रहना ही बेहतर समझा।
2. गोला नगर पंचायत चेयरमैन: कार्यकर्ताओं का हुजूम था, पर नहीं मिला सिंबल
जिला पंचायत के झटके के बाद अस्मिता चंद ने स्थानीय निकाय चुनाव का रुख किया। वे गोला बाजार नगर पंचायत से चेयरमैन पद के लिए पूरी तरह तैयार थीं। जमीन पर कार्यकर्ताओं का हुजूम और जनता का समर्थन उनके पक्ष में दिख रहा था, लेकिन यहाँ भी अंदरूनी समीकरणों के चलते भाजपा ने उनके नाम पर मुहर नहीं लगाई। एक बार फिर चुनाव के मुहाने पर खड़े होकर भी वे चुनावी मैदान से वंचित रह गईं।
3. चिल्लूपार विधानसभा: जमीनी पकड़ के बावजूद अंदरूनी खींचतान की शिकार
सिर्फ स्थानीय निकाय ही नहीं, बल्कि चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र में भी अस्मिता चंद की राजनीतिक सक्रियता लगातार बनी रही। विशेषकर महिलाओं और स्थानीय मतदाताओं के बीच उनकी मजबूत पैठ जगजाहिर है। इसके बावजूद, जब भी विधानसभा चुनाव में टिकट की बात आई, तो स्थानीय गुटबाज़ी और राजनीतिक समीकरणों के चलते उनकी दावेदारी को दरकिनार किया जाता रहा।
जब सब्र का बांध टूटा…
राजनीति में कोई भी नेता अपनी ज़मीन गंवाकर लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकता। लगातार उपेक्षा और बार-बार चुनावी मौकों से दूर रखे जाने के बाद अस्मिता चंद ने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए बड़ा फैसला लिया।
भाजपा को अलविदा कहकर ‘हाथी’ पर सवार हुईं अस्मिता चंद के इस कदम ने चिल्लूपार और गोला क्षेत्र के सियासी माहौल में गरमाहट ला दी है। बसपा द्वारा उन्हें चिल्लूपार से उम्मीदवार बनाए जाने की खबरों के बाद अब इस सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प और रोमांचक होने के आसार हैं।



