कागजी साबित हुआ ‘जीरो टॉलरेंस’: 72 जिलों के DM और 68 कप्तानों ने नहीं उठाया फोन, PRO के पहरे में पिसती जनता!

कागजी साबित हुआ ‘जीरो टॉलरेंस’: 72 जिलों के DM और 68 कप्तानों ने नहीं उठाया फोन, PRO के पहरे में पिसती जनता!
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में जनसुनवाई और पारदर्शिता को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त निर्देशों को प्रशासनिक बेलगाम रवैये ने पूरी तरह हवा में उड़ा दिया है। नवंबर 2020 में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सभी जिलों के जिलाधिकारी (DM) और पुलिस कप्तान (SSP/SP) अपने आधिकारिक CUG फोन खुद रिसीव करेंगे। किसी PA, PRO या अधीनस्थ को फोन देने पर सख्त पाबंदी थी और लापरवाही पर सीधी कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
लेकिन धरातल पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। जब जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) तक को अफसर तवज्जो नहीं दे रहे, तब आम जनता की सुनवाई की उम्मीद करना महज एक छलावा साबित हो रहा है।
*7 दिन के ‘रिएलिटी टेस्ट’ में प्रशासनिक दावे बेनकाब*
7 दिनों तक प्रदेश के सभी 75 जिलों में तीन अलग-अलग समय पर किए गए कॉल टेस्ट में बेहद शर्मनाक आंकड़े सामने आए हैं:
3 जिलों को छोड़ सब ‘लापता’: 75 में से केवल 3 जिलों—औरैया, इटावा और लखीमपुर खीरी—के जिलाधिकारियों ने खुद कॉल रिसीव कर फरियादी की समस्या सुनी।
PRO का रटा-रटाया ढर्रा: फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, कानपुर, अयोध्या और सुल्तानपुर समेत 25 जिलों में PRO ने एक ही रटा-रटाया जवाब चिपकाया— “साहब मीटिंग या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में व्यस्त हैं।”
टालमटोल की सलाह: आगरा, झांसी और जालौन समेत 12 जिलों में PRO खुद ही ‘सलाहकार’ बनकर फरियादियों को टालते दिखे। उनका साफ कहना था— “पहले तहसील/SDM के पास जाइए या कल ऑफिस आकर लिखित शिकायत दीजिए।”
खाकी में पूरी तरह सन्नाटा: 68 जिलों के SSP/SP और 7 पुलिस कमिश्नरों में से एक भी शीर्ष अधिकारी से सीधी बात नहीं हो सकी।
फोन बंद या नो-रिस्पॉन्स: हापुड़, मिर्जापुर और संतकबीरनगर के SP का CUG नंबर स्विच ऑफ मिला। वहीं लखनऊ, गाजियाबाद, बागपत और बलिया समेत 16 जिलों में लगातार घंटियां बजने के बाद भी किसी ने फोन उठाने की ज़हमत नहीं उठाई।
जनता के टैक्स के 9 करोड़ स्वाहा
पुलिस विभाग के CUG नंबरों के रख-रखाव और नेटवर्क पर हर साल करीब 9 करोड़ रुपये का सरकारी खजाना खर्च होता है। इसके बावजूद अफसर अपनी सहूलियत के हिसाब से फोन PRO या स्टेनो को सौंपकर निश्चिंत बैठे हैं। पीड़ित की बात अधिकारी तक पहुंचेगी या नहीं, इसका फैसला भी PRO ही कर रहे हैं। कुशीनगर, मुरादाबाद और सोनभद्र जैसे जिलों में तो कॉल बैक के नाम पर सिर्फ छलावा देखने को मिला।
बड़ा सवाल:
जब मुख्यमंत्री के सीधे और सख्त आदेशों के बावजूद जिले के सबसे जिम्मेदार अफसर अपने CUG नंबर पर आई कॉल तक उठाने का वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं, तो राज्य में “जीरो टॉलरेंस” और “त्वरित जनसुनवाई” के दावों में कितनी सच्चाई बची है? क्या नियमों को ताक पर रखने वाले इन अफसरों पर शासन स्तर से कोई कड़ी कार्रवाई होगी, या जनता यूं ही PRO के पहरे और टालमटोल के भरोसे भटकती रहेगी?


