लखनऊ जिला अदालत के पास अवैध चैंबरों पर चलेगा बुलडोजर: सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इंकार, कहा– ‘पद के नाम पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं’

लखनऊ जिला अदालत के पास अवैध चैंबरों पर चलेगा बुलडोजर: सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इंकार, कहा– ‘पद के नाम पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं’

लखनऊ: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के पास बने 12 अवैध वकील चैंबरों और अन्य अतिक्रमणों को हटाने का रास्ता साफ कर दिया है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इंकार करते हुए साफ किया कि सार्वजनिक भूमि और न्यायालय परिसर पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां:
पद का नहीं मिलेगा लाभ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति वकील है या बार एसोसिएशन का पदाधिकारी, इस आधार पर किसी भी अवैध निर्माण को संरक्षण या छूट नहीं दी जा सकती। पहले कब्जा करना और फिर पद का हवाला देकर उसे बचाने की कोशिश करना पूरी तरह अनुचित है।
सड़कों पर कब्जे पर नाराजगी: जस्टिस विक्रम नाथ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उन्होंने खुद उस क्षेत्र की स्थिति देखी है कि किस तरह मुख्य सड़क को घेरकर ट्रैफिक बाधित किया गया था। कोर्ट ने पूछा कि आखिर मुख्य सड़क पर ऐसे अवैध ढाँचे कैसे खड़े किए जा सकते हैं?
मध्यस्थता की मांग खारिज: वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल द्वारा मामले को मध्यस्थता में भेजने के सुझाव से कोर्ट ने असहमति जताई और कहा कि अतिक्रमण के मामलों में मध्यस्थता का कोई औचित्य नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि:
6 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के आसपास सार्वजनिक रास्तों और उपयोगिता भूमि पर बने अवैध निर्माणों के खिलाफ आदेश जारी किया था। हाईकोर्ट ने नगर निगम को 72 कब्जेदारों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष रखने का अवसर दिया था, ताकि स्वामित्व का प्रमाण न दे पाने की स्थिति में 30 अगस्त तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा सके। इस नोटिस के खिलाफ कुछ वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, जहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली।



