गोरखपुर : दस माह बाद पीड़ित शिक्षिका को कार्यभार ग्रहण करने का मिला आदेश….

दस माह बाद पीड़ित शिक्षिका को कार्यभार ग्रहण करने का मिला आदेश….
सच को गलत कराने वाली कथित शिक्षक गिरोह की साजिश नाकाम, उच्च न्यायालय में नहीं टिक पाया फर्जीवाड़े का आरोप….
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने तथ्यों की जांच के बाद दिया कार्यभार ग्रहण करने का निर्देश….
गोरखपुर। करीब दस माह तक संघर्ष करने के बाद भटहट विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय डुमरी नंबर-1 की सहायक अध्यापिका प्रीती जायसवाल को आखिरकार न्याय मिल गया। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) ने पूरे प्रकरण की तथ्यात्मक जांच के बाद उन्हें पुनः कार्यभार ग्रहण कराने का आदेश जारी कर दिया है। यह आदेश 20 मई 2026 को पत्रांक 3196-3205/26-27 के माध्यम से जारी किया गया।
मामले की शुरुआत 28 जुलाई 2025 को हुई थी, जब तत्कालीन बीएसए द्वारा एक दूरभाष शिकायत के आधार पर प्रीती जायसवाल की सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया गया था। आरोप लगाया गया था कि उनके शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में गड़बड़ी है। बिना ठोस जांच के जारी इस आदेश को लेकर शिक्षिका को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, जिससे उन्हें मानसिक, सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
पीड़ित शिक्षिका ने इस आदेश को चुनौती देते हुए माननीय उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपने सभी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों और अभिलेखों के साथ न्यायालय में गुहार लगाई। उच्च न्यायालय के निर्देश पर उनके दस्तावेजों की जांच कराई गई, जिसमें कहीं भी किसी प्रकार का फर्जीवाड़ा या अनियमितता नहीं पाई गई।
जांच में आरोप निराधार साबित होने के बाद उच्च न्यायालय ने प्रीती जायसवाल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें सवेतन बहाल करने और पुनः कार्यभार ग्रहण कराने का आदेश दिया। न्यायालय के इस आदेश ने न केवल शिक्षिका को राहत दी, बल्कि पूरे प्रकरण में लगाए गए आरोपों की सच्चाई भी उजागर कर दी।
इस मामले में यह भी सामने आया कि कुछ कथित शिक्षक समूह या व्यक्तियों द्वारा शिक्षिका के खिलाफ साजिश रची गई थी। आरोप है कि इन लोगों ने गलत तथ्यों और भ्रामक शिकायतों के जरिए उनकी नौकरी समाप्त कराने का प्रयास किया। हालांकि, यह साजिश न्यायालय में टिक नहीं सकी और सत्य की जीत हुई।
वर्तमान जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण की पुनः जांच कराई। उन्होंने सभी दस्तावेजों और तथ्यों का बारीकी से अवलोकन किया और उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया। इसके बाद उन्होंने शिक्षिका को पुनः कार्यभार ग्रहण करने का निर्देश जारी किया।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2025 में सेवा समाप्ति का आदेश जारी होने के बाद कुछ लोग इसे अपनी सफलता मानकर प्रसन्न थे, लेकिन प्रीती जायसवाल ने अपने दस्तावेजों और सत्य पर भरोसा रखते हुए न्याय की लड़ाई जारी रखी। अंततः उच्च न्यायालय और प्रशासनिक जांच में उनकी सत्यता साबित हुई।
यह मामला प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी कर्मचारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि इससे संबंधित व्यक्ति के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
प्रीती जायसवाल का यह संघर्ष अन्य लोगों के लिए भी एक उदाहरण है कि यदि किसी के साथ अन्याय होता है, तो कानूनी रास्ता अपनाकर न्याय प्राप्त किया जा सकता है। फिलहाल, शिक्षिका को पुनः कार्यभार ग्रहण करने का आदेश मिलने के बाद उनके परिवार और समर्थकों में खुशी का माहौल है।
कुल मिलाकर, यह प्रकरण दर्शाता है कि सत्य को दबाने की कोशिश भले ही की जाए, लेकिन अंततः न्याय की जीत होती है और झूठ बेनकाब हो ही जाता है।



