लोकतंत्र फुटपाथ पर और पत्रकार परिवार को सड़क पर लाने की आर्थिक चोट !

लोकतंत्र फुटपाथ पर और पत्रकार परिवार को सड़क पर लाने की आर्थिक चोट !
विशाल घेराबंदी, विज्ञापन कराया बंद और दिव्य समाचार के माध्यम से निशाना बनाया विशाल विभाग !
लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को मिटाने और total channel को विज्ञापन देने की नई साजिश !
उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता में हेमंत तिवारी एक ऐसा नाम है जिसका सनकी ट्रंप और उसकी अय्याशियों से भारी एप्सटीन फाइल भी मुकाबला नहीं कर सकती, हिटलर की तानाशाही हो या ट्रंप की सनक, अपनी मठाधीशी, अपने एकछत्र सम्राज्य और अपनी स्वयंभू नेतागिरी को बनाए रखने के लिए कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्तर पर आम पत्रकारों को दबाने, कुचलने में अपनी कूटनीति, कौशल और अपने ख़ास गुर्गों की दहशत का परिचय दिया जाता रहा है और इसी के चलते मठाधीश पत्रकारों के बीच हेमंत तिवारी खलनायक नहीं नायक की भूमिका में स्थापित है।
उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के हितों एवं उनकी समस्याओं को शासन प्रशासन के सम्मुख रखने के लिए जिस समिति का गठन किया जाता रहा है उसकी निष्क्रियता को देखते हुए आम पत्रकारों ने एक नई समिति बनाने का निर्णय लिया जिसका लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव किये जाने की घोषणा की गई और शासन प्रशासन द्वारा लिखित आदेश में जिस जगह को चुनाव कराए जाने हेतु आदेश पारित किया गया वहां ताला जुड़वाने के लिए स्वयंभू नेता हेमंत तिवारी अपने 2, 4 खास कारिंदों को लेकर लोकभवन में लगातार 2 दिन की घेराबंटी करने के बाद प्रमुख सचिव संजय प्रसाद से मिलने में न सिर्फ कामयाब रहा बल्कि पत्रकारों के चुनाव को फुटपाथ पर लाकर अपना वर्चस्व दिखा दिया, पत्रकारों के अहम मुद्दे चाहे मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार पर जानलेवा हमला हो या दिवंगत पत्रकार के परिवार को आर्थिक।मदद की दरकार हो, जैसे मौके पर अक्सर बीमार होने या मुंबई रहने वाले हेमंत तिवारी ने अपनी पूरे दमखम और ख़ास कारिंदों के साथ पत्रकारों के लोकतांत्रिक चुनाव को फुटपाथ पर तो ला दिया लेकिन भविष्य में।कोई लघु एवं मध्यम समाचार पत्र के प्रतिनिधि के रूप में साहस करें इसके लिए सूचना निदेशक के माध्यम से ऐसे समाचार पत्रों का रातोरात विज्ञापन बंद कराकर आर्थिक चोट पहुंचाई है।
जुल्म फिर जुल्म है, बढ़ता है, तो मिट जाता है,
तुमने जिस कलमकार को दबाना चाहा
आज वह पुनर्गठित बनकर निकला है
कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं ख़बर बनकर
ऐसी शख्सियत कि मिटाओ, तो मिटाए न बने
ऐसे शोले, कि बुझाओ तो बुझाए न बने
ऐसे समाचार जो दबाओ तो दबाए न बनें।
पत्रकारों का चुनाव फुटपाथ पर और परिवार को सड़क पर लाने की आर्थिक चोट देने वाले भूल गए कि अब सरफरोशी की तमन्ना दिल मे है, देखना है हेमंत, ज़ोर कितना तुम्हारे कारिंदों में है।
बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हो जाती अपनी बादशाहत को बनाए रखने के लिए हेमंत तिवारी द्वारा एक ऐसी योजना बनाई गई जिससे आगे भविष्य में कोई दूसरा पत्रकार न तो विरोध में दिखाई दे और न ही कभी कोई लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराने की सोच सकें, एक तरफ रातों-रात अपने प्रभुत्व और दादागिरी के चलते सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक विशाल सिंह से चुनाव में भागीदारी करते दिख रहे पत्रकारों से संबंधित समाचार पत्रों को दिए जा रहे हैं विज्ञापन पर रोक लगवाई तो वहीं दूसरी तरफ अपने ही खास दिव्य कारिंदे के समाचार पत्र में विशाल सिंह के विरुद्ध समाचार प्रकाशित कर अपने दमखम और अपनी कुशल रणनीति का परिचय दिया।
कहने को तो विशाल सूचना एवं जनसंपर्क विभाग जैसे विशाल विभाग के निदेशक पद पर बैठे हैं लेकिन समाचार प्रकाशित होने के फौरन बाद हेमंत तिवारी के पैलेस में अपने लोगों को बटलर की तरह भेजकर पुनर्गठित समिति को विघटन करने के समस्त आदेश का पालन करने की कूटनीति पर सहमति देते नजर आये जिससे भविष्य में ऐसे दिव्य समाचार न प्रकाशित हों।
लाखों रुपये की सरकारी विभागों की बकायेदारी और पुलिस विभाग द्वारा मान्यता नवीनीकरण के संबंध में जिस हेमंत तिवारी की negative रिपोर्ट दी गयी है उनकी टीम का प्रयास सिर्फ इतना है कि लघु एवं मध्यम समाचार पत्र को मिलने वाले विज्ञापन को बंद कर उनके खास total channel पर ही समस्त विज्ञापन की कृपादृष्टि बरसती रहे जबकि उत्तर प्रदेश के विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा मात्र 14 न्यूज़ चैनल ही प्रदेश से प्रकाशित किए जाने का सूचना प्रदान की गई है ऐसे में एक बड़ी धनराशि का विज्ञापन टोटल चैनल पर दिया जाना जिनका सजीव प्रकाशन , प्रसारण कही दिखता न हों, सिर्फ और सिर्फ स्वयंभू नेता हेमंत तिवारी एवं उनके खास लोगों को लाभ पहुंचाना ही दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता जगत में मठाधीशो की मठाधीशी बनी रहे इसके लिए न सिर्फ प्रमुख सचिव सूचना संजय प्रसाद से पत्रकारों के चुनाव को फुटपाथ पर ला दिया गया बल्कि उनके परिवार को सड़क पर लाने के लिए विज्ञापन भी बंद कराना कितना उचित और कितना अनुचित है, ये बड़ा सवाल खड़ा हो गया है लेकिन इतिहास गवाह है जुल्म जब-जब बढ़ता है तभी क्रांति का आगाज़ होता है ओर जुल्म करने वाले से ज्यादा गुनहगार जुल्म सहने वाला होता है, पुनर्गठित समिति से क्रांति की शुरुआत हो गयी है और पत्रकार परिवार को सड़क पर लाने की हर कोशिश का पुरजोर तरीके से जवाब दिया जाएगा, ज़रूरत पड़ी तो परिवार के साथ हेमंत तिवारी के पैलेस पर धरना प्रदर्शन किया जाएगा।



