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Varanasi-विष्णु पुराण संपूर्ण सारांश: 28 मई दिन गुरुवार- भगवान श्री हरि विष्णु ने समुंद्र मंथन हेतु लिया कुर्मावतार!Indianow24

विष्णु पुराण संपूर्ण सारांश: 28 मई दिन गुरुवार- भगवान श्री हरि विष्णु ने समुंद्र मंथन हेतु लिया कुर्मावतार!

वाराणसी से- ब्यूरो चीफ: कृष्णा राय की रिपोर्ट;

एक ओर जहां देवराज इंद्र ने असुर लोक में दानवों से वार्तालाप के दौरान अमृत और अमरत्व का जिक्र करते हुए समुद्र मंथन का प्रस्ताव रखते हैं वहीं दैत्य गुरु शुक्राचार्य देवराज इंद्र से यह प्रश्न करते हैं कि भला दानवों को अमृत की क्या आवश्यकता?? इस पर देवराज इंद्र दैत्य गुरु शुक्राचार्य को दानवों के भविष्य और अस्तित्व की ओर चिंता व्यक्त करते हुए यह बताते हैं कि यदि दैत्य गुरु शुक्राचार्य मृत्यु को प्राप्त हुए तो उनके (गुरु शुक्राचार्य) मरणोपरांत दानवों को पुनः जीवित कौन करेगा ??और साथ ही साथ देवराज इंद्र भगवान शंकर द्वारा दिए गए संजीवनी वरदान के बारे में स्मरण कराते हुए दैत्य गुरु शुक्राचार्य को यह बताते हैं कि भगवान शंकर ने उन्हें उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर यह संजीवनी मंत्र इस वचन के साथ दिया था कि वे भविष्य में अन्य किसी भी व्यक्ति को इस संजीवनी विद्या का वरदान नहीं दे सकते। देवराज इंद्र के इस तर्क को सुनकर समस्त दानवों समेत दैत्य गुरु शुक्राचार्य भी समुद्र मंथन के प्रस्ताव का स्वागत करते हैं और यह आश्वासन देते हैं की समस्त दैत्य इस समझौते की मर्यादा का निर्विघ्नं पालन करेंगे और इस प्रस्ताव की स्वीकृति के पश्चात समस्त देवासुर समुद्र के तट पर जा पहुंचते हैं।
देव और असुर दोनों ही समुंद्र मंथन के लिए तैयार तो हो जाते हैं परंतु प्रश्न यह उठता है कि इतने विशाल समुद्र का मंथन किया किस प्रकार जाएगा क्योंकि मंथन करने हेतु एक विशाल रस्सी और मथनी की आवश्यकता होती है।
देव और असुरों के बीच मैत्रीपूर्ण समझौते के दुर्गम दृश्य को देखते हुए भगवान श्री हरि विष्णु मुस्कुराते हैं और आगामी कार्य निर्वहन हेतु पक्षीराज गरुड़ का आवाहन करते हैं। भगवान विष्णु के आवाहन पर पक्षीराज गरुड़ उनके दर्शन हेतु प्रस्तुत होते हैं। भगवान श्री हरि पक्षीराज गरुड़ और अपने सुदर्शन चक्र को यह आदेश देते हैं कि वे दोनों जाएं और जाकर मंदराचल पर्वत को धरती से अलग कर समुंद्र तट तक ले जाने का दुर्गम कार्य करें। भगवान विष्णु के आदेशानुसार सुदर्शन चक्र मंदराचल पर्वत को धरती से काट कर अलग कर देते हैं तत्पश्चात पक्षीराज गरुड़ वासुकी नाग की सहायता से विशालकाय मंदराचल पर्वत को समुद्र तट तक ले जाते हैं।
इन सब के दौरान महर्षि नारद भगवान श्री हरि विष्णु के दर्शन करने पहुंचते हैं जहां भगवान श्री हरि महर्षि नारद को एक महत्वपूर्ण कार्य करने हेतु अवगत कराते हैं।
दूसरी ओर पक्षीराज गरुड़ वासुकी नाग समेत मंदराचल पर्वत को लेकर समुद्र के तट पर पहुंचते हैं जहां देवासुर पहले से पक्षीराज की प्रतीक्षा में आसत्त रहते हैं।
समुंद्र मंथन जैसे दुर्गम कार्य की व्यवस्थाओं के उपरांत समस्त देवों और असुरों के मध्य द्वंद इस बात पर होने लग जाती है कि वासुकी नाग के मुख और पूंछ की ओर कौन रहेगा??
समस्त देव चाहते हैं कि वे वासुकी नाग के पूंछ की ओर रहें दानव चाहते हैं कि वह पूंछ की ओर रहें, और इसी विषय को लेकर समस्त देवासुरों में वाद विवाद होने लग जाता है। इसी बीच देवराज इंद्र भगवान श्री हरि विष्णु की प्रेरणा से समुंद्र मंथन स्थल पर पहुंचते हैं और फिर असुरों को यह समझाते हैं कि देवों पर विजय के उपरांत वे श्रेष्ठ बन चुके हैं और इसलिए उन्हें वासुकी नाग के शरीर के श्रेष्ठ भाग की ओर रहना चाहिए और यह तर्क सुनकर समस्त असुर महर्षि नारद के नीति पूर्ण बातों में आ जाते हैं और वासुकी नाग के मुख की ओर रहने के प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं।
जैसे ही वासुकी नाग को मंदराचल पर्वत पर लपेट कर समुद्र के बीचो-बीच स्थापित कर दोनों सिरों को देव और दानवों के मध्य देकर समुंद्र मंथन का आरंभ किया जाता है तुरंत ही मंदराचल पर्वत विशालकाय समुद्र के बीच डूबने उतराने लग जाता है जिसके फल स्वरूप समुंद्र मंथन का कार्य और भी जटिल बन जाता है। समस्त देव भगवान श्री हरि विष्णु का आवाहन करते हैं और अपने भक्तों के आवाहन की पुकार सुनकर भगवान श्री हरि विष्णु माता लक्ष्मी को अपनी बाहों में समाहित कर अपने द्वितीय अवतार- कुर्मावतार स्वरूप में समुंद्र मंथन स्थल पर मौजूद समस्त देवासुरों के समक्ष प्रस्तुत होते हैं। भगवान विष्णु के कुर्मावतार के दर्शन कर वहां मौजूद समस्त देव प्रफुल्लित हो उठते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु दर्शन देने के उपरांत समुंद्र के भीतर प्रवेश कर मंदराचल पर्वत को अपने पीठ पर धारण करते हैं और इस प्रकार समुद्र मंथन का प्रारंभ होता है।
अब यह देखने वाली बात होगी कि इस समुंद्र मंथन के फलस्वरूप कौन-कौन सी वस्तुएं समुंद्र के गर्भ से बाहर आती हैं।