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Varanasi-वाराणसी ने नामकरण के पूरे किए 64 साल, जाने भोले की नगरी का इतिहास जिस वाराणसी का अथर्ववेद में भी है उल्लेख!Indianow24

वाराणसी ने नामकरण के पूरे किए 64 साल, जाने भोले की नगरी का इतिहास जिस वाराणसी का अथर्ववेद में भी है उल्लेख!

वाराणसी से
डिस्ट्रिक्ट रिपोर्टर
रविंद्र सिंह की रिपोर्ट:
IndiaNow24!

वाराणसी l धर्म, कला, संस्कृति, सभ्यता का शहर काशी। पंचांग के अनुसार वैसाख पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा और चंद्रग्रहण के योग में काशी का नाम वाराणसी किया गया था। 24 मई, 1956 को प्रशासनिक तौर पर इसका वाराणसी नाम स्वीकार किया गया। पुराणों से भी प्राचीन शहर काशी के नए नामकरण के 64 साल आज पूरे हो गए। काशी के विद्वानों का कहना है कि वाराणसी नाम बेहद पुराना है। इतना पुराना कि मत्स्य पुराण में भी इसका जिक्र है।
वाराणसी गजेटियर 1965 में प्रकाशित किया गया था। उसके दसवें पृष्ठ पर जिले का प्रशासनिक नाम वाराणसी किये जाने की तिथि अंकित है। आजादी के बाद प्रशासनिक तौर पर वाराणसी नाम की स्वीकार्यता राज्य सरकार की संस्तुति से इसी दिन की गई थी।
वाराणसी की संस्तुति जब शासन स्तर पर हुई तब डॉ. संपूर्णानंद मुख्यमंत्री थे। स्वयं डॉ. संपूर्णानंद की पृष्ठभूमि वाराणसी से थी और वो यहां काशी विद्यापीठ में अध्यापन से भी जुड़े थे।
समस्त दुखों को समाप्त करने वाली है काशी
वाराणसी निविशते न वसुंधरायां तत्र स्थितिर्मखभुआं भवने निवास:। ततीर्यमुक्तवपुषामत एवं मुक्ति: स्वर्गात परं पदमुपदेतु मुदेतुकीदृक।। अर्थात काशी समग्र भारत के प्रतिरूप के रूप में मौजूद है। यह समस्त दुखों को समाप्त करने वाली मोक्षनगरी है। यह इस भूमंडल से बाहर है, यह पृथ्वी पर नहीं है। काशी अलग-अलग कालों में समय के साथ और विकसित होती गई। महाभारत में ही पहली बार वाराणसी का एक तीर्थ के रूप में उल्लेख हुआ। ईसा की तीसरी सदी से आगे वाराणसी का धार्मिक महत्व तेजी से बढ़ता गया। – पं. दीपक मालवीय, ज्योतिषाचार्य
अथर्ववेद में भी मिलता है वाराणसी का उल्लेख
वाराणसी का वास्तविक इतिहास शायद इतिहास के पन्नों से भी पुराना है। यह विश्व के प्राचीन नगरों में से एक है। पुराणों के अनुसार मनु से 11वीं पीढ़ी के राजा काश के नाम पर काशी बसी। वहीं वाराणसी नाम पड़ने के बारे में अथर्ववेद में वाराणसी को वरणावती नदी से संबंधित कहा गया है। वरणा से वाराणसी शब्द बना है। कुछ वरुणा व असि नदी के बीच बसने की वजह से दोनों नदियों के नाम पर इसे वाराणसी शब्द समझते हैं। काशी के पांच नाम प्रचलित रहे हैं। काशी अविमुक्त, आनंद कानन और महाश्मशान। पुराणों में इनका उल्लेख मिलता है। -पद्मश्री महामहोपाध्याय भगीरथ प्रसाद त्रिपाठी वागीश शास्त्री

एक मत के अनुसार अथर्ववेद में वरणावती नदी का जिक्र आया है, जो आधुनिक काल में वरुणा का पर्याय माना जाता है। वहीं असि नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा गया है। अग्निपुराण में असि नदी को नासी का भी नाम दिया गया है। पद्यपुराण में भी दक्षिण-उत्तर में वरुणा और असि नदी का जिक्र है। मत्स्यपुराण में वाराणसी का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता। प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन्न क्षेत्रे मम प्रिये। इसके अतिरिक्त भी विविध धर्म ग्रंथों में वाराणसी, काशी और बनारस सहित यहां के पुराने नामों के दस्तावेज मौजूद हैं। – डॉ. रामनारायण द्विवेदी, मंत्री, काशी विद्वत परिषद

प्राचीन वाराणसी सदैव बरना पर ही स्थित नहीं थी, गंगा तक उसका प्रसार हुआ था। कम से कम पतंजलि के समय में अर्थात ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तो यह गंगा के किनारे-किनारे बसी थी, जैसी कि अष्टाध्यायी के सूत्र पर पतंजलि ने भाष्य अनुगङ्ग: वाराणसी, अनुशोणं पाटलिपुत्रं से विदित है। मौर्य और शुंग युग में राजघाट पर गंगा की ओर वाराणसी के बसने का प्रमाण हमें पुरातत्व के साक्ष्य से भी लग चुका है। वरणा शब्द एक वृक्ष का ही द्योतक है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे। जैसे कोशंब से कौशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो। – पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य

इतिहास पर गौर करें तो बनारस में बस्तियों का विस्तार चौदहवीं से लेकर अठारहवीं सदी के बीच हुआ। आपस में गूंथे मकान, संकरी-पथरीली गलियां, प्राचीन शैली में बनावट व व्यापार के पुरातन तरीके हर एक को अचंभित करते हैं। इनमें भवन एक दूसरे में कुछ इस तरह गूंथ कर बने हैं कि कई गलियां भगवान भास्कर की रोशनी तक के लिए तरस जाती हैं लेकिन तपती गर्मी में भी इन मोहल्लों के घर शीतलता का अहसास कराते हैं।