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रुपये में कमजोरी से बढ़ी परेशानी, इस कारोबारी हफ्ते डॉलर के मुकाबले रुपये में 161 पैसे की गिरावट

रुपये की यह कमजोरी निर्यातक समुदाय के लिए अच्छा होता है क्योंकि उन्हें डॉलर के भाव में भुगतान होता है। रुपये की इस गिरावट का खामियाजा आम जनता को इसिलए भुगतना पड़ेगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते कच्चा तेल यानी क्रूड का फायदा उन्हें पूरा नहीं मिल सकेगा।

नई दिल्ली। कोविड के बढ़ते मामलों से इकोनॉमी के समक्ष जो चिंता बढ़ रही है, उसमें रुपये की बुरी हालत जख्म पर नमक छिड़कने जैसा काम कर रही है। पिछले पांच दिनों से डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हुआ है। शुक्रवार को मुद्रा बाजार में एक समय रुपया डॉलर के मुकाबले पिछले आठ महीनों के सबसे कमजोर स्तर 74.97 तक गिर गया था। हालांकि, बाजार बंद होने के समय यह 74.73 के स्तर पर था, जो गुरुवार के मुकाबले 15 पैसे कमजोर है।

इस कारोबारी हफ्ते डॉलर के मुकाबले रुपये में 161 पैसे की गिरावट हुई है। विशेषज्ञ रुपये की इस कमजोरी के लिए आरबीआइ की तरफ से वित्तीय व्यवस्था में पर्याप्त फंड उपलब्ध कराने व बांड्स खरीदने की घोषणा को जिम्मेदार मान रहे हैं।

वैसे, रुपये की यह कमजोरी निर्यातक समुदाय के लिए अच्छा होता है, क्योंकि उन्हें डॉलर के भाव में भुगतान होता है। रुपये की इस गिरावट का खामियाजा आम जनता को इसिलए भुगतना पड़ेगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते कच्चा तेल यानी क्रूड का फायदा उन्हें पूरा नहीं मिल सकेगा। तेल कंपनियां क्रूड खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करती हैं और रूपये के कमजोर होने से उन्हें डॉलर के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है।

देश में पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमत तय करने में रुपये की कीमत भी एक अहम भूमिका निभाती है। कमजोर रुपया देश में खाद्य तेलों की कीमतों को भी बढ़ाएगा, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 70 फीसद खाद्य तेल आयात करता है। वैसे भी पिछले छह महीनों में खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में 50 फीसद तक की बढ़ोतरी हो चुकी है।

नोमुरा रिसर्च और एसबीआइ की अलग-अलग रिपोर्ट रुपये की स्थिति को लेकर जारी की गई हैं और इन दोनों में आरबीआइ की तरफ से बांड खरीदने के एलान को सबसे बड़ी वजह बताया गया है। 7 अप्रैल, 2021 को मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए आरबीआइ गवर्नर ने एक लाख करोड़ रुपये के बांड्स खरीदने का एलान किया है। हालांकि, इसका मकसद वित्तीय संस्थानों व सरकारों के पास लोन देने या खर्च करने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना है। एसबीआइ और नोमुरा रिसर्च दोनों का कहना है कि यह रुपये के लिए नकारात्मक पक्ष है। बाजार में और ज्यादा फंड देने से महंगाई बढ़ने का खतरा है।

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