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सवाल पृथ्वी के अस्तित्व का:-पृथ्वी दिवस पर विशेष

सवाल पृथ्वी के अस्तित्व का:-पृथ्वी दिवस पर विशेष

लेखन:- प्रशान्त त्रिपाठी(अधिवक्ता-उच्चतम न्यायालय नई-दिल्ली एवं राष्ट्रीय उपसचिव ह्यूमन राइट एससोसिएसन ऑफ इंडिया)

मानव और प्रकृति के बीच एक अटूट संबंध है। प्रकृति मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को निर्धारित करती है तो वहीं वह मानव के विभिन्न क्रियाकलापों से स्वयं प्रभावित भी होती है।

जैव-विविधता में ह्रास और जलवायु परिवर्तन मानव-गतिविधियों द्वारा प्रकृति के चिंताजनक ढंग से प्रभावित होने के उदाहरण हैं। यह मानव-जन्य प्रभाव एक निश्चित समयावधि के बाद स्वयं मानव जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। मानव द्वारा पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन से पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र को लगातार क्षति पहुंच रही है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार हर तीन सेकंड में, दुनिया एक फुटबॉल पिच को कवर करने के लिए पर्याप्त जंगल को खो देती है और पिछली शताब्दी में हमने अपनी आधी आर्द्रभूमि को नष्ट कर दिया है। यूएनईपी ने कहा है कि हमारी 50 प्रतिशत प्रवाल भित्तियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं और 90 प्रतिशत तक प्रवाल भित्तियां 2050 तक नष्ट हो सकती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मनुष्य ने काफी प्रगति की है। इस तकनीकी प्रगति के तकाजों ने प्रकृति को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। मनुष्य अपने विकास की दौड़ में प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहा है, बिना यह सोचने की  इसके परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं।

पृथ्वी पर जीवन के लिए पानी, हवा, मिट्टी, खनिज, पेड़, जानवर, भोजन आदि हमारी मूलभूत आवश्यकताएं है इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी प्रकृति को स्वच्छ और स्वस्थ रखें।

बताते चलें सन 1960-70 के दशक से, जब पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही थी। पूरे के पूरे जंगल साफ़ किए जा रहे थे। दुनिया का ध्यान इस तरफ आकर्षित करने और पृथ्वी के संरक्षण करने या बचाने के लिए सितम्बर 1969 में सिएटल, वाशिंगटन में एक सम्मलेन हुआ।

इस सम्मलेन में विस्कोंसिन के अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने यह घोषणा की कि 1970 की वसंत में पर्यावरण पर राष्ट्रव्यापी जन साधारण प्रदर्शन किया जाएगा। 1970 में हुए इस राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन में अमेरिका में स्कूलों, कॉलेजों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया जिससे इस आंदोलन में बीस हज़ार लोग शामिल हुए।
पृथ्वी दिवस मानना आरम्भ हो चुका था पर वैज्ञानिकों के लिए या पर्यावरणविदों के लिए अभी भी बढ़ता प्रदूषण और पृथ्वी का बिगड़ता संतुलन चिंता के विषय थे। सभी को चिंता थी कि अगर स्थिति ऐसी ही बिगड़ती रही तो जंगल,जमीन,जीव,जंतु सभी लुप्त हो जाएंगे।

इसी विषय को ध्यान में रखते हुए 1992 में ब्राज़ील की राजधानी रिओ डे जेनेरिओ में एक सम्मलेन हुआ जिसे अर्थ समिट,पृथ्वी सम्मेलन या रिओ समिट के नाम से जाना गया। इस सम्मेलन में 172 देशों के प्रतिनिधियों, हजारों स्वयंसेवी संगठनों और अनेक बहुराष्ट्रीय निगमों ने भाग लिया।

इस सम्मेलन से पृथ्वी को विश्व राजनीति से एक ठोस आधार मिला जिसके बाद एजेंडा-21 पारित किया गया जो पृथ्वी के संरक्षण का मार्गदर्शक बना है। हर वर्ष 22 अप्रैल यानि विश्व पृथ्वी दिवस पर संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को द्वारा एक थीम जारी की जाती है जिसके माध्यम से विश्व के सभी 192 देशों में यह यह मनाया जाता है।

इस थीम के माध्यम से पृथ्वी के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना आसान हो जाता है। वर्ष 2020 में जब दुनिया कोरोना जैसे नए वायरस से लड़ रही थी, लॉक डाउन, क़्वारंटीन, कॉन्सेंट्रेटर जैसे भारी भारी शब्द पहली बार सुनने को मिल रहे थे,तब भी विश्व पृथ्वी दिवस मनाया गया, एक ऐसे जज़्बे के साथ कि जब यह महामारी समाप्त हो जाएगी तो हम इस पृथ्वी का पुनरुत्थान करेंगे और फिर से एक बेहतर दुनिया बनाएंगे। 2020 में इस दिन की थीम थी क्लाइमेट एक्शन। 2021 में जब दुनिया की स्थिति सुधरने लगी और जीवन पटरी पर आने लगा तब इस दिन की थीम थी रिस्टोर आवर अर्थ। इस वर्ष 2022 में इसकी थीम है हमारी धरती, हमारा स्वास्थ्य। जैसी स्थिति पृथ्वी की होती है वैसा ही जन जीवन प्रभावित होता है और वैसे ही हमारा स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

विश्व पृथ्वी दिवस का बहुत महत्व है, यह एक ऐसा दिन है जो हमें अपने आभामंडल से निकल कर पृथ्वी के बारे में सोचने और कुछ करने को विवश करता है। घटती हरियाली, सूखता पानी,पिघलते ग्लेशियर, बढ़ता तापमान इत्यादि विषयों की वास्तविकता से हम अवगत होते हैं। धरती की सुरक्षा के लिए प्रेरित करना और इसे एक कर्त्तव्य समझने का सन्देश हम पूरे विश्व में इस दिवस के माध्यम से देते हैं।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पृथ्वी दिवस को लेकर देश और दुनिया में जागरूकता का भारी अभाव है! सामाजिक या राजनीतिक दोनों ही स्तर पर इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जाते। कुछ पर्यावरण प्रेमी अपने स्तर पर कोशिश करते रहे हैं, किंतु यह किसी एक व्यक्ति, संस्था या समाज की चिंता तक सीमित विषय नहीं होना चाहिए! सभी को इसमें कुछ न कुछ आहुति देना पड़ेगी तभी बात बनेगी।

पृथ्वी के पर्यावरण को बचाने के लिए हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, तो कम से कम इतना तो करें कि पॉलिथीन के उपयोग को नकारें, कागज का इस्तेमाल कम करें और रिसाइकल प्रक्रिया को बढ़ावा दें.. क्योंकि जितनी ज्यादा खराब सामग्री रिसाइकल होगी, उतना ही पृथ्वी का कचरा कम होगा।

मनुष्य ही ज़िम्मेदार है

पृथ्वी हमारे अस्तित्व का आधार है, जीवन का केंद्र है। यह आज जिस स्थिति में पहुँच गई है, उसे वहाँ पहुँचाने के लिये मनुष्य ही ज़िम्मेदार हैं। आज सबसे बड़ी समस्या मानव का बढ़ता उपभोग है, लेकिन पृथ्वी केवल उपभोग की वस्तु नहीं है। वह मानव जीवन के साथ-साथ असंख्य वनस्पतियों-जीव-जंतुओं की आश्रयस्थली भी है।

हम इन सब के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन सवाल यह है कि किया क्या जा सकता है? क्या कुछ ऐसा है जो हम मनुष्य, स्कूल, कॉलेज, कॉलोनी एवं समाज के तौर पर सामूहिक रूप से कर सकते हैं? हम कैसे अपना योगदान दे सकते हैं?

इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं और हम सभी बड़ी आसानी से ऐसा कर सकते हैं। महात्मा गांधी का एक प्रसिद्ध कथन है… “हम दुनिया में जो भी बदलाव लाना चाहते हैं, उसे पहले हमें खुद पर लागू करना चाहिये।“ हमें आज यही करने की ज़रूरत है। हम मनुष्यों की जीवनशैली ने पर्यावरण को लगभग बर्बाद कर दिया है। हमारी गतिविधियों और उन्हें कार्यरूप देने के तरीकों का अंतर बेहद महत्त्वपूर्ण होता है। इसीलिये बदलाव की दिशा में सबसे पहला कदम यह होना चाहिये कि हम अपने कार्यों के प्रति सचेत और जागरूक हों। हमें बदलावों को आत्मसात करना होगा।

इस ब्रह्मांड की चेतना है मनुष्य

पृथ्वी दिवस के अवसर पर हम सभी को पृथ्वी के प्रहरी बनकर उसे बचाने और आवश्यकतानुरूप उपभोग का संकल्प लेना होगा, तभी हम उसकी लंबी आयु की कामना कर सकते हैं। मनुष्य इस ब्रह्मांड का मस्तिष्क यानी चेतना है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद हमारी पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी स्पष्ट नहीं है।

मनुष्य ने न केवल जलवायु चक्रों को बदल दिया है, बल्कि ब्रह्मांड के जीवित स्वरूप को नष्ट कर इसकी जैविक लय को अवरुद्ध कर दिया है। ब्रह्मांड में और किसी अन्य जीव के पास मनुष्य जैसे विशेषाधिकार नहीं हैं तथा सिर्फ मनुष्य ही पृथ्वी को जीवंत रखने में सबसे प्रभावी योगदान कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि छठे विशाल तरीके से प्रजातियों के लुप्त होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, मधुमक्खियाँ, चींटियाँ, गुबरैले (बीटल), मकड़ी, जुगनू जैसे कीट जो हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं, अन्य स्तनधारी जीवों, पक्षियों और सरीसृपों की तुलना में आठ गुना तेज़ी से विलुप्त हो रहे हैं। इस रिपोर्ट में पिछले 13 वर्षों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रकाशित 73 शोधों की समीक्षा की गई है। इसमें शोधकर्त्ताओं ने पाया कि सभी जगहों पर इनकी संख्या में कमी आने के कारण अगले कुछ दशकों में 40 प्रतिशत कीट विलुप्त हो जाएंगे।

कीटों की संख्या हर साल ढाई प्रतिशत की दर से कम हो रही है। कीट-पतंगों का कम होना पारिस्थितिकी तंत्र के लिये घातक है, क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला के संतुलन के लिये कीट-पतंगों का होना बहुत ज़रूरी है।

जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, बढ़ते कंक्रीट के जंगल, शहरीकरण, अवैध शिकार और खेती-बाड़ी में कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल, समुद्र में व्याप्त प्लास्टिक प्रदूषण इन प्रजातियों के लुप्त होने के लिये ज़िम्मेदार हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने विलुप्त होने की कगार पर खड़े जीव-जंतुओं की जो सूची जारी की है, उसके अनुसार, 26,500 से अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है, जिनमें 40% उभयचर, 34% शंकुधारी, 33% कोरल रीफ, 25% स्तनधारी और 14% पक्षी हैं।

आज विश्व में हर जगह प्रकृति का दोहन जारी है तथा इसके दोहन और प्रदूषण की वज़ह से विश्व स्तर पर लोगों की चिंता सामने आना शुरू हुई है। आज जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिये सबसे बड़ा संकट का कारण बन गया है। यदि पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा तो इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इस विश्व पृथ्वी दिवस पर संकल्प लेना चाहिये कि हम पृथ्वी और उसके वातावरण को बचाने का प्रयास करेंगे।

पृथ्वी को जीवंत बनाये रखने के लिए मनुष्यों के साथ–साथ पशु–पक्षी पेड़-पौधों का रहना भी अत्यंत आवश्यक है। आज जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधों की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसलिए पारिस्थितिक तंत्र के प्राकृतिक वैभव की रक्षा करना और पृथ्वी पर प्रत्येक जीवित प्राणी के साथ सह-अस्तित्व की एक प्रणाली विकसित करना आज के दौर की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

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