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सक्ती : नगर के हृदय स्थल परशुराम चौक सक्ती में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण एहतियातन बरतते हुए हर्ष उल्लास के साथ भगवान परशुराम जी की जयंती मनाई गई

नगर के हृदय स्थल परशुराम चौक सक्ती में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण एहतियातन बरतते हुए हर्ष उल्लास के साथ भगवान परशुराम जी की जयंती मनाई गई ..

शैलेंद्र कुमार द्विवेदी इंडिया नाउ २४

सक्ती – नगर के हृदय स्थल परशुराम चौक सक्ती में भगवान परशुराम जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर फल मिठाई एवं श्रीफल चढ़ाकर शाम 6:00 बजे भगवान परशुराम जी की महा आरती की गई तथा प्रसाद वितरण किया यह आयोजन विगत कई वर्षों से किया जा रहा है आज 14 मई को भी हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी भगवान परशुराम जी की जयंती हर्षोल्लास के साथ कोविड-19 के गाइडलाइन का पालन करते हुए मनाई गई, नगर के विप्र बंधु ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष राजेश शर्मा (बाबा महाराज), विप्र फाउंडेशन के जिला अध्यक्ष उमेश कुमार शर्मा (बंटी शर्मा), सजन शर्मा, कमल शर्मा, दुलेस महाराज, दीनदयाल शर्मा, तपेश शर्मा, राजेश शर्मा घड़ी, शिव शर्मा बुन्नी महाराज, ठंडू शर्मा, अतुल शर्मा, राजेश चंद्र त्रिवेदी, देवेश शर्मा सहित विप्र बंधुओं ने भगवान परशुराम जी की प्रतिमा पर पुष्प हार चढ़ा कर आशीर्वाद लिया, इस संबंध में ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष राजेश शर्मा (बाबा महाराज) ने बताया अक्षय तृतीया के दिन ही हर साल परशुराम जयंती मनाई जाती है हालांकि कई बार पंचांग में भेद की वजह से यह एक तिथि आगे या पीछे भी हो सकती है, हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, परशुराम भगवान विष्णु भगवान के छठे अवतार हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी जीवित हैं, इस बार कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण परशुराम जयंती लॉकडाउन में कोविड-19 एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी एडवाइजरी के तहत सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मनाई गई, तथा अधिकांश लोगों ने घरों में ही रह कर भगवान परशुराम जी की पूजा कर परशुराम जयंती मनाई,
वही विप्र फाउंडेशन के जिला अध्यक्ष उमेश कुमार शर्मा (बंटी शर्मा) ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम त्रेता काल में ऋषि जमदग्नि के घर परशुराम का जन्म हुआ था. उन्हें भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है. यही वजह है कि उन्हें समय-समय पर भगवान परशुराम के नाम से भी संबोधित किया गया. वैसे हाथों में हमेशा एक अस्त्र परशु रखने के कारण भी उन्हें परशुराम नाम दिया गया. पुराणों में इस अस्त्र परशु का खूब उल्लेख मिलता है. मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम के परशु अस्त्र में चमत्कारिक शक्तियां थीं और ये खुद भगवान शिव ने उन्हें दिया था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवराज इन्द्र ने महर्षि जमदग्नि के पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न होकर ऋषि की पत्नी रेणुका को परशुराम के जन्म कान आशीर्वाद दिया था. उनका वास्तविक नाम जामदग्न्य था. पिता भृगु ऋषि ने नामकरण संस्कार के तहत उनका नाम राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा दिया हुआ परशु लेने के कारण उनका नाम परशुराम पड़ा. यह भी कहा जाता है कि, परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे. इन्होंने धरती पर 21 बार क्षत्रियों का संहार किया था. गणेश भगवान को भी इनके गुस्से का शिकार होना पड़ा था. क्रोध के कारण भगवान परशुराम जी ने गणेश भगवान पर फरसे का वार कर दिया था जिससे उनका एक दांत टूट गया था. मान्यता है कि भगवान परशुराम जयंती से ही सतयुग प्रारंभ हुआ था. आज 14 मई को परशुराम चौक सक्ती में हम सब विप्र बंधुओं के द्वारा कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण एहतियातन बरतते हुए हर्ष उल्लास के साथ भगवान परशुराम जी की जयंती मनाई गई |