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कम्युनिस्टों का काला सच

कम्युनिस्टों का काला सच

लेखन:-प्रशान्त त्रिपाठी अधिवक्ता उच्चतम न्यायालय,दिल्ली एवं राष्ट्रीय उप-सचिव ह्यूमन राइट एससोसिएसन ऑफ इंडिया।

आपने वामपंथी और दक्षिणपंथी शब्द खूब सुने होंगे। भारत की बात करें तो यहां मार्क्सवादी पार्टियों को वामपंथी पार्टियां और हिंदुत्व की विचारधारा वाली पार्टियों को दक्षिणपंथी पार्टियां कहा जाता है। वैश्विक स्तर पर बात की जाए तो उदार कहे जाने वाले तबके के लिए वामपंथी यानी लेफ्ट विंग और कंजर्वेटिव के लिए दक्षिणपंथी यानी राइट विंग का इस्तेमाल किया जाता है। यानी आज के समय में वामपंथ और दक्षिणपंथ को विचारधारा से जोड़ दिया गया है। लेकिन शुरुआत में इसका विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं था। यह सिर्फ असेंबली में बैठने की एक व्यवस्था थी।

साल 1789 और गर्मी का मौसम था। फ्रेंच नैशनल असेंबली के सदस्य संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए जमा हुए। 16वें किंग लुई को कितना अधिकार मिलना चाहिए, इसको लेकर सदस्यों के बीच काफी मतभेद था। सदस्य दो हिस्से में बंट गए। एक हिस्सा उनलोगों का था जो राजशाही के समर्थक थे और दूसरे वे सदस्य थे जो राजशाही के खिलाफ थे। उन्होंने अपने बैठने की जगह भी बांट ली। राजशाही के विरोधी क्रांतिकारी सदस्य पीठासीन अधिकारी की बायीं ओर बैठ गए जबकि राजशाही के समर्थक कंजर्वेटिव सदस्य पीठासीन अधिकारी के दायीं ओर बैठ गए। इस तरह वहां से लेफ्ट विंग और राइट विंग का कॉन्सेप्ट वुजूद में आया।

कुछ समय तक समाचारपत्रों ने लेफ्ट और राइट विंग का इस्तेमाल किया। 1790 तक करीब यह टर्म चलता रहा। फिर जब नेपोलिय बोनापार्ट का फ्रांस में शासन आया तो कई सालों तक लेफ्ट और राइट का कॉन्सेप्ट गायब रहा और साथ ही फ्रेंच असेंबली के अंदर दायें और बायें बैठने की कोई व्यवस्था नहीं रही। फिर 1814 में संवैधानिक राजशाही के शुरू होने के साथ ही लिबरल और कंजर्वेटिव असेंबली में दायें और बायें बैठने लगे। फिर 19वीं सदी के मध्य तक फ्रांस के स्थानीय अखबारों में विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं के लिए लेफ्ट और राइट का इस्तेमाल होने लगा। राजनीतिक पार्टियों ने तो बाद में खुद को ‘सेंटर लेफ्ट’, ‘सेंटर राइट’, ‘एक्सट्रीम लेफ्ट’ और ‘एक्सट्रीम राइट’ के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया।

18वीं सदी तक फ्रांस का ‘लेफ्ट’ और ‘राइट’ कॉन्सेप्ट दुनिया के बाकी हिस्सों में पहुंच गया। लेकिन कुछ सालों तक इंग्लिश बोले जाने वाले देशों में इस टर्म का इस्तेमाल नहीं हुआ। वहां 20वीं सदी की शुरुआत में ही जाकर ये टर्म लोकप्रिय हुए। वैसे अब बैठने की व्यवस्था से इस शब्द का कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन कुछ देश में अब भी बैठने की इस तरह की व्यवस्था है। जैसे अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकंस हाउस और सीनेट चैंबर्स में एक दूसरे के आमने-सामने बैठते हैं।

कोई विचारधारा जब खुद के अतिरिक्त किसी और के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाती है तो उसका हिंसक हो जाना ही उसकी अंतिम परिणति होती है.

वामपंथ के झंडे तले समय समय पर उगने वाली दर्जनों विचारधाराओं में यह दोष व्याप्त रहा है. वे अपने नाकारा सिद्ध हो चुके सिद्धांतों की आड़ लेकर सबको गलत घोषित करती हैं और एक सीमा के बाद हिंसा के माध्यम से अपने विरुद्ध उठने वाली आलोचना के हर आवाज को जड़ से समाप्त करने निकल पड़ती हैं. इसका परिणाम यह हुआ है कि, वामपंथ की वैचारिक परिधि में पनपी विचारधाराओं का इतिहास और वर्तमान भी हिंसा और रक्त से सना हुआ है. 20 वीं शताब्दी में रूस की बोल्शेविक क्रांति के बाद से ही जहां-जहां वामपंथी सत्तासीन हुए, उन देशों और क्षेत्रों में राजनीतिक हत्याओं और नरसंहारों की लम्बी फेहरिस्त है. वर्ष 1999 में आयी स्टेफेन कोर्तुअस की पुस्तक ‘ब्लैक बुक में कम्युनिज्म’ में लगाये गये सांख्यकीय अनुमान के मुताबित, साम्यवाद, स्टालिनवाद, माओवाद तथा इनकी अन्य सहोदर विचारधाराओं ने 10 करोड़ मनुष्यों को मंशापूर्ण ढंग से जान से मारा है. जबकि 2017 में बोल्शेविक क्रांति के सौ साल पूरे होने पर ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में छपे एक लेख में प्रोफेसर एस. कोत्किन ने बताया कि 10 करोड़ का आंकड़ा सिर्फ तो सीधे तौर पर हुई हत्याओं और नरसंहारों का है, इससे कहीं अधिक संख्या में तो लोग कम्युनिस्ट शासनों के द्वारा पैदा की गयी भूखमरी और सुनियोजित दुर्व्यवस्थाओं में मारे गये हैं.

वामपंथ के त्रासदीपूर्ण इतिहास में कुछ पृष्ठ इतने लोमहर्षक हैं कि वे सम्पूर्ण मानवता की स्मृति में एक स्थायी पीड़ा के रूप में अंकित हो चुके हैं. ऐसी ही एक घटना थी चीन की राजधानी बीजिंग के थियानमेन चौक पर 04 जून 1989 को हुआ हजारों छात्रों का बर्बर नरसंहार जिसमें देंग जिओपिंग के नेतृत्व वाली चीन की साम्यवादी सरकार ने निर्दोष छात्रों के ऊपर सेना के टैंक चला दिए थे.

उन छात्रों की मांग थी कि चीन की सरकार उन्हें कुछ मूलभूत मानवीय अधिकार दे- जिसमे अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता की मांग प्रमुख थी. युवाओ की यह मांग थी कि दुनिया के दूसरे देशों की तरह उन्हें भी स्वतंत्र चिंतन की छूट मिले. शिक्षा के नाम पर वामपंथी प्रोपागेंडा पढ़ाना बन्द किया जाए। वामपंथी दुनिया के अन्य देशों में तो वैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती होने का दावा करते नहीं थकते हैं, लेकिन जिस जगह भी वे सत्ता में आते हैं वहां विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वे पूरी तरह कुचल देते हैं. चीन में 1949 में सत्ता हासिल करने के बाद ही माओवादी व्यवस्था में किसी भी नागरिक को बोलने या स्वतंत्र चिंतन करने की आजादी नहीं है. मीडिया को काम करने की छूट नहीं है.  लोगों की आवाज़ को दबाने के लिए  सेंसरशिप, प्रतिबन्ध, निषेधज्ञता, कारावास, हिंसा एवं हत्याएं वामपंथी कानूनों का हिस्सा है. तीन दशक पहले, मार्च-अप्रैल 1989 से ही बीजिंग में युवा एवं छात्र अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार की इस अमानवीय परम्परा के खिलाफ खुलकर आने लगे.
समाचार एजेंसियों के ऊपर पूर्ण सरकारी नियंत्रण होने के बावजूद भी सरकार के खिलाफ विरोध शुरू होने की खबर फैलने लगी. विरोध कर रहे छात्रों को मिलने वाला समर्थन बढ़ता गया. बीजिंग शहर की हृदयस्थली में बसा थियानमेन चौक ही छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन स्थल बन गया. धीरे धीरे इस प्रदर्शन की खबर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी फ़ैल गयी. हालाँकि, चीन में स्थानीय या विदेशी, किसी भी प्रकार के मीडिया को यह प्रदर्शन कवर नहीं करने दिया जा रहा था. कम्युनिस्ट पार्टी आफ़ चाइना की सरकार ने इस विरोध के स्वर में विद्रोह का नाद सुन लिया था. इसलिए उसने इस विरोध को कुचलने के लिए एक ऐसा तरीका चुना कि आने वाले दशकों तक फिर कोई चीन की साम्यवादी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत ना कर सके.

भारत के वामपंथी जो मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विषयों को चीख-चीख कर उठाते हैं, वे आज तक चीन की वामपंथी सरकार द्वारा की गयी इस नृशंसता पर अपना होंठ सिले बैठे हैं. विश्वविद्यालयों के सेमिनार कक्षों और मीडिया जगत में संपादकीय कुर्सियों से देश का विमर्श नियंत्रित करने वाले वामपंथियों ने थियानमेन नरसंहार की पूरी घटना को ही अनदेखा कर दिया. यदि इस घटना का भारत के लोगों को उसी समय विस्तार से पता चल गया होता तो वामपंथी पाखंड उसी समय पूर्ण रूप से उजागर हो गया होता. देश ने यह देख लिया होता कि ऊंची आवाज़ में ‘बोलने की आज़ादी’ का नारा लगाने वाले वामपंथी ही ‘बोलने की आजादी’ के सबसे बड़े दुश्मन रहे हैं. देश ने यह भी देख लिया होता कि ‘पीपुल’ या जनता की दुहाई देकर अपनी राजनीति करने वालों ने चीन के युवाओं का जिस सेना से दमन किया उसके नाम में भी ‘पीपुल’ लगा हुआ था. वामपंथ की कलई तभी खुल गयी होती.

हालाँकि, भारत में वामपंथ अपने कुकर्मों के बोझ तलें देर सबेर गिर ही गया. पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों नें 34 साल के अपने शासन में राजनीतिक सभ्यता और शिष्टाचार को ताक पर रख कर पूरी तरह से लोकतंत्र को ध्वस्त किया. कैसे भुलाया जा सकता है 1979 में वामपंथी सरकार द्वारा मछिलझापी में शरण मांगने आये निःसहाय दलितों का भीषण नरसंहार?  कौन भूल सकता है 21 जुलाई 1993 की घटना को जब बंगाल की वामपंथी सरकार ने विरोध प्रदर्शन कर रहे युवा कार्यकर्ताओं पर खुलेआम गोलियां चलवा दी थी जिसमे 13 लोग मारे गए थे।

चाहे केरल के सदानंद मास्टर के दोनों पैरों को काट डालने का दुस्साहस हो या उस्मानिया यूनिवर्सिटी में तिरंगा फहराने के लिए माओवादियों द्वारा मार दिए गये जगनमोहन रेड्डी हों या फिर बंगाल की तापसी मलिक जैसी युवतियों को वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया बलात्कार और जलाकर मार डालने की घटना हो। भारत में भी वामपंथियों ने अपने अत्याचारों को अपने चरम पर पहुँचाने में कोई कोताही नहीं बरती है.1962 के चीन हमले के समय ही वामपंथियों ने चीन के प्रति अपनी निष्ठा को उजागर कर दिया था. आज जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी से सम्बंधित सूचना छिपाने के लिए चीन को दोषी करार दे रहा है, तो वामपंथियों का प्रचार तंत्र चीन का चारण-गान कर रहा है.

पिछले सौ सालों में वामपंथी सोच के कारण मानवता के शरीर पर अनेक घाव लगे हैं. आज के दिन 31 वर्ष पहले थियानमेन चौक पर जो बर्बरता हुई, वो आने वाली पीढ़ियों को वामपंथ के वास्तविक चेहरे का परिचय कराती रहेगी. भारत में विश्वविद्यालय कैम्पसों में देश तोड़ने के नारे लगाने वाले वामपंथी अपनी हर हरकत को अभिव्यक्ति की दुहाई देकर सही ठहराने का प्रयास करते हैं. लेकिन उन्हीं विश्वविद्यालयों में उन्होंने राष्ट्रीय विचारों के विद्यार्थियों को कभी भी बोलने की आजादी नहीं लेने दी। बोलना तो छोड़िए, पाठ्यक्रमों में कम्युनिस्ट प्रोपागैंडा घोल कर उन्होंने न सिर्फ थियानमेन जैसी घटनाओं को छिपाया, बल्कि छात्रों का ‘ब्रेन-वाश’ करके  उनकी सोचने की आजादी तक छीन ली. आज यही माओवादी अनेक रूप लेकर भारत में लोकतंत्र को कुचलते हुए चीन की व्यवस्था को लाना चाहते हैं. अबूझमाड़ और जंगलमहल में हथियार पकड़ने वाले माओवादी और शहरों में कलम अथवा माइक पकड़ने वाले ‘अर्बन नक्सलस’ एक ही हैं. देश में यह सच्चाई सामने आ चुकी है.

आज के दिन चीन के उन लोकतंत्र-आकांक्षी युवाओं ने अपने प्राण देकर कभी ना भुलाया जा सकने वाला सन्देश दिया. भारत में आज की पीढ़ी के युवाओं को वामपंथ से लड़ते हुए शहीद होने वाले हर व्यक्ति के बलिदान का मूल्य समझना चाहिए.

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