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बड़े भाई साहब नाटक में दिया आदर्शों को अपनाने का संदेश

बड़े भाई साहब नाटक में दिया आदर्शों को अपनाने का संदेश
-बड़े भाई साहब नाटक में बताया बड़ों के अनुभवों को नजरअंदाज न करें
-अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी से काम करने का भी दिया संदेश

रिपोर्टर योगेश गुरूग्राम India Now24
गुरुग्राम। मिलेनियम सिटी कला को बढ़ावा देते हुये साप्ताहिक कार्यक्रम आयोजित करने के क्रम में त्रिखा थियेटर अकादमी की ओर से रविवार की रात्रि नाटक का मंचन कराया गया। मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित बड़े भाई साहब की कहानी पर यह नाटक मंचित किया गया।
अकादमी के निर्देशक एवं संचालक हरियाणा कला परिषद, मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर कुरुक्षेत्र के पूर्व उप-निदेशक एवं प्रभारी विश्व दीपक त्रिखा ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियां हमेशा ही शिक्षाप्रद रही हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से किसी न किसी समस्या पर प्रकार किया है। यहां सुशांतलोक स्थित त्रिखा थियेटर अकादमी में मंचित इस नाटक ने दर्शकों को बांधे रखा। थियेटर गु्रप मशरूम्स हट की ओर से यह नाटक पेश किया गया, जिसके निर्देशक सुनील चिटकारा हैं। सुनील चिटकारा कला के क्षेत्र में बड़ा नाम हैं। उन्होंने फिल्म बजरंगी भाईजान में सलमान खान के साथ भी काम किया है। सुनील चिटकारा के मुताबिक बड़े भाई साहब समाज में समाप्त हो रहे कर्तव्यों के अहसास को दुबारा जीवित करने का प्रयास मात्र है। छोटे भाई के रूप में रिषभ पारिक बड़े भाई के रूप में विशाल सैनी ने बेहतरीन भूमिका निभाई।
नाटक में दिखाया गया कि बड़े भाई साहब अपने कर्तव्यों को संभालते हुये अपने भाई के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं। उनकी उम्र इतनी अधिक नहीं है, जितनी उनकी जिम्मेदारियां हैं। लेकिन उनकी जिम्मेदारियां उनकी उम्र के आगे छोटी नजर आती हैं। वह स्वयं के बचपन को छोटे भाई के लिए तिलाजंलि देते हुये भी नहीं हिचकिचाते। उन्हें इस बात का अहसास है कि उनके गलत कदम छोटे भाई के भविष्य को बिगाड़ सकते हैं। वह अपने भविष्य से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूकते। 14 साल के बच्चे द्वारा उठाया गया कदम छोटे भाई के उज्जवल भविष्य की नींव रखता है। यही आदर्श बड़े भाई साहब को छोटे भाई के सामने और भी ऊंचा बना देते हैं। यह कहानी सीख देती है कि मनुष्य उम्र से नहीं अपने किये गये कामों और कर्तव्यों से बड़ा होता है। वर्तमान में मनुष्य विकास तो कर रहा है, परंतु आदर्शों को भूलता जा रहा है। भौतिक सुख एकत्र करने की होड़ में हम अपने आदर्शों को छोड़ चुके हैं। अपने छोटे और बड़ों के प्रति हमारी जिम्मेदारियां हमारे लिये आवश्यक नहीं हैं। मुंशी प्रेमचंद ने अपनी इस कहानी में इन्हीं कर्तव्यों के महत्व को दर्शाया है, जिसे नाटक रूपी माला में पिरोकर यहां पेश किया गया।