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राजनीतिज्ञों और अवसरवादियों ने बिगाड़ा चित्रकूट का माहौल

राजनीतिज्ञों और अवसरवादियों ने बिगाड़ा चित्रकूट का माहौल

चित्रकूट में हाल ही में हुए दो मासूमों के अपहरण और दोहरे हत्याकांड की वारदात से चित्रकूट की तो हानि हुई लेकिन, राजनेताओं की चाँदी हो गयी | पूरे घटनाक्रम पर यदि नज़र डालें तो शक के घेरे में पूरा चित्रकूट आता है | लेकिन संदेह की सुई लौट कर केवल एक संस्थान की तरफ मोड़ दी जा रही है और शेष संलिप्त व्यक्तियों, संस्थानों और उनके आश्रयदाताओं से कोई प्रश्न ही नहीं पूछ रहा,आखिर क्यों?
घटना किसी एक संस्थान के परिसर में घटी तो वह संस्थान तो स्वयं पीड़ित है, तो क्यों उसे मोहरा बनाकर आरोपियों की तरफ से मिडिया ध्यान भटकने का काम कर रही है | सारा दोषारोपण सदगुरु ट्रस्ट को दिया जा रहा है,आखिर क्यों? क्या चित्रकूट में हो रहे सभी अपराध के लिए ट्रस्ट प्रबंधन व्यवस्था करे ? दो अपहरणकर्ता जब परिसर में गलत नियत से आए तो क्या हवाई मार्ग से आए थे? नहीं, चित्रकूट के सड़क मार्गों से, गली नुक्कड़ चौराहों से आए थे | फिर क्यों नहीं उन्हें वहीँ रोका या दबोचा गया ?
चित्रकूट में कैसे बिना नंबर प्लेट की मोटर साईकिल घूम रही थी, अपराधी अपनी जेब में तमंचा लिए घूम रहे थे ? आखिर कैसे? ट्रस्ट परिसर में लगे हुए सीसीटीवी कैमरों के अलावा कौन से बाहरी कैमरों में कैद हो सका अपराधियों का आवागमन ? यह भी एक विचारणीय तर्क है ?
जिस चित्रकूट में प्रतिमाह अमावस्या मेले में लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं, वहां की सड़कों पर कौन से ट्राफिक सिग्नल लगे हैं, कौन से आरटीओ के अधिकारी खड़े हैं? जो नकाब पोश लोगों को चेकिंग करें या रोकें? कितने कैमरे सड़कों पर एहतियात के तौर पर लगे हैं ? उत्तर हम सभी जानते हैं | यह ढीला पोला रवैया यहाँ के चुने गए जनप्रतिनिधियों की देंन हैं | नगर परिषद से विधानसभा तक सब प्रतिनिधि मौन और ग्राउंड लेवल का काम जीरो |
ट्रस्ट की संलिप्तता के सन्दर्भ में भी यदि चर्चा की जाये तो, ट्रस्ट के मंदिर का पुजारी का बेटा सम्मिलित था | जो ट्रस्ट के परिसर में नहीं अपितु अपने निजी मकान में रहता था | वह विश्वविद्यालय का छात्र था और शेष आरोपी भी ट्रस्ट से सम्बंधित नहीं थे और एक आरोपी तो बच्चों का ट्यूशन टीचर भी निकला, जो सारे घटनाक्रम का सूत्रधार था | सभी आरोपी विश्वविद्यालय के छात्र थे, लेकिन अपनी-अपनी गर्दन बचने के लिए ट्रस्ट को रसूखदार और पैसे वाला बता कर मुख्य बात से भटकाया जा रहा है | वास्तव में सांसद-विधायक बताएं की आज घटना के 15 दिनों तक उन्होंने कितने कैमरे लगवाए,कितना पुलिस बल मुहैया कराया जो आगामी समय में ऐसी वारदातें रोक सके?
यह तो सभी जानते हैं कि इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा भ्रम और अफवाह सोशल मीडिया और प्रेस की वजह से बनी | क्यूंकि उन्हें इस मामले को खूब मिर्च-मसाले के साथ प्रस्तुत करने का और अपने निजी स्वार्थ और ट्रस्ट से व्यतिगत विरोध का बदला लेने का मौका मिल गया | आज कहा जा रहा है कि, आरोपियों को बर्खास्त कर के ट्रस्ट और विश्वविद्यालय झूठी संवेदना का नाटक कर रहे हैं | तो यदि, बर्खास्त न करे तब मीडिया क्या कहेगी ? चित भी मेरी-पट भी मेरी वाली मीडिया को आज शोक संतप्त परिवार से मात्र और मात्र अपने मन की खबर उनके शब्दों से निकलवाकर परोसना है |
विश्वविद्यालय और ट्रस्ट परिसर में आप हम सभी कभी न कभी गए ही हैं, हमसे कब फिरौती मांगी गयी ? कब हमें चाकू की नोक पर लूटा गया | लेकिन यदि, किसी एक कर्मचारी की वजह से कोई गलत काम हुआ तो पूरे संस्थान को आरोपी बनाना गलत बात है | किसी बैंक में डकैती होती है, और यदि कोई बैंककर्मी उसमें संलिप्त रहता हैं, तो क्या उस बैंक शाखा को बंद कर दिया जाता है ? प्रश्न कई हैं, लेकिन जैसे तोड़ मरोड़ के यह न्यूज प्रस्तुत की जा रही है उससे पीड़ित परिवार को न्याय नहीं बल्कि मीडिया का दंश दे रही है |
जो भी इस मामले में दोषी है उन सभी को मृत्यदंड मिलना ही चाहिए, लेकिन इसका निर्णय न्याय प्रणालीका करेगी या घर बैठी जनता ? चित्रकूट का माहौल बिगड़ा लेकिन कौन किसके घर गया था ? जिन्हें ट्रस्ट के गुंडे कह कर संबोधित किया जा रहा है वह कोई किसी के घर नहीं गए थे | जब जनाक्रोश का फायदा उठाकर शरारती और उपद्रवी तत्त्व उनके परिसर में घुस कर तोड़फोड़ और आगजनी करने लगे तब आत्म रक्षा में उन्हें खदेड़ा गया | यदि नहीं खदेड़ते तो क्या ट्रस्ट परिसर में रह रहीं बहन-बेटियों और बच्चों तक उन्हें चुपचाप पहुँच जाने देते? पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच की जाये तो सारे तथ्य और अवसरवादियों मंसूबे उभर के सामने आ जायेंगे |
INDIA NOW24
राज बहादुर सिंह
मऊ चित्रकूट