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निष्ठा सांस्कृतिक मंच ने कुरुक्षेत्र में नाट्य मंचन से लूटी वाहवाही

निष्ठा सांस्कृतिक मंच ने कुरुक्षेत्र में नाट्य मंचन से लूटी वाहवाही
दुखांत और सुखांत के साथ हुआ मौत क्यों रात भर नहीं आती
नाटक मंचन में गुरुग्राम के कलाकारों ने दिखाया अभिनय कौशल

रिपोर्टर योगेश गुरूग्राम India Now24

निष्ठा सांस्कृतिक मंच द्वारा निरंतर सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से कला को बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। जिसके अंर्तगत नाटकों, नृत्य तथा गायन व वादन कार्यक्रमों के आयोजन प्रमुख रहते हैं। ऐसे में  निष्ठा सांस्कृतिक मंच द्वारा प्रसिद्ध रंगकर्मी मोहनकांत के निर्देशन में नाटक मौत क्यों रात भर नहीं आती का मंचन मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर की भरतमुनि रंगशाला में किया गया।
इस अवसर पर रंगकर्मी अनिल दत्ता बतौर मुख्यअतिथि मैक में पहूचे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता अजमेर सिंह ने की। कार्यक्रम में मंच संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। नाटक मंचन से पूर्व मैक के क्षेत्रीय निदेशक तथा निष्ठा सांस्कृतिक मंच के अध्यक्ष संजय भसीन ने अतिथियों को पौधा देकर स्वागत किया। नाटक मौत क्यों रात भर नहीं आती की शुरुआत तो एक यथार्थवादी नाटक की तरह से होती है, लेकिन ज्यों-ज्यों यह आगे बढ़ता है, नाटक एक फार्स की शक्ल अख्तियार कर लेता है । अपने पूरे घटनाक्रम में नाटक मध्य. वर्गीय मानसिकता एवं मूल्यों पर हलकी-हलकी चोट करता चलता है । नाटक मुख्य किरदार अमित खन्ना के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। अमित खन्ना जो अपने परिवार की जरुरते पूरी करने के लिए पैसे नहंी जुटा पा रहा, तो उसे आत्महत्या का ख्याल आ जाता है, जिसके कारण उसके बीमा की रकम उसके परिवार को मिल सकती है। रात भर मरने के बारे में सोचने पर भी अमितखन्ना को आत्महत्या करने का कोई तरीका नहीं सूझता। तभी नाटक में सूत्रधार का प्रवेश होता है, जो नायक को आत्महत्या करने के विभिन्न तरीके बताता है।
आत्महत्या से पहले सूत्रधार नायक से सुसाईड नोट भी लिखवा लेता है। रात को नायक सूत्रधार के कहने पर घर में रखी एक पुड़िया से जहर खा लेता है औैर बिस्तर पर लेट जाता है। जब सुबह उसकी पत्नी उसे देखती है और सुसाईड नोट पढ़ती है तो विलाप करना शुरु कर देती है। अचानक से नायक जाग जाता है और जहर को नकली बताकर अपनी मौत न होने का पछतावा करता है। तब नायक की पत्नी उसे बताती है कि जिस पुड़िया से उसने जहर खाया उसमें मिठा सोड़ा था। नायक अपने किये पर पछताता है और पैसे की कमी को आत्महत्या का कारण बताता है। तभी एक डाक के माध्यम से नायक को उसके मित्र का पत्र प्राप्त होता है। जिसमें नायक के नाम सत्तर लाख का चैक मिलता है। पैसे मिलने की खुशी में नायक दिल का दौरा पडने के कारण मर जाता है। इस प्रकार नाटक का दुखांत हो जाता है। इस नाटक की दिलचस्प बात इसके दो अंत रही।
किसी भी घटनाक्रम का एक ही अंत हो सकता है, लेकिन संभावना के स्तर पर नाटककार
कई तरह के अंत सोच सकता है । ऐसे ही सूत्रधार दोबाारा दर्शकों के सामने आता है
और दुखांत की अपेक्षा सुखांत के बारे में दर्शकों को बताता है। नाटक दोबारा
शुरु हो जाता है और नायक पैसे मिलने की खुशी अपनी पत्नी को जताता है और पूरे
परिवार के साथ हंसी-खुशी जीने का निर्णय कर लेता है। इस प्रकार नाटक के दोनों
अंत दर्शकों को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे। प्रताप सहगल द्वारा लिखे नाटक
में नायक की भूमिका टीवी धारावाहिक जिंदगी की महक के अभिनेता हर्षवर्धन ने
निभाई। वहीं पत्नी की भूमिका में तनूश्री ने अपने किरदार को जींवत किया।
सूत्रधार तथा अन्य भूमिकाओं में स्वयं नाटक निर्देशक तथा पत्थर के फूल और
माचिस जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके मोहनकांत रहे। नाटक निर्देशक की भूमिका
गोल्डी सिंगला ने निभाई। अन्य कलाकारों में मोहित, प्रकाश घई आदि शामिल रहे।
नाटक के अंत में अतिथियों द्वारा कलाकारों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर
निष्ठा सचिव हरजीत सिंह, पी.के.सिन्हा, अर्पित भसीन, अंकित भसीन, धर्मपाल आदि
उपस्थित रहे।