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सुनी जानी चाहिए देश की 80 फीसद आबादी की बात: रमन मलिक

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सुनी जानी चाहिए देश की 80 फीसद आबादी की बात: रमन मलिक

हिंदू धर्म है जीवन शैली का विषय

रिपोर्टर योगेश गुरूग्राम  India Now24

गुरुग्राम। हिंदू बाहुल भारत देश में जो हिंदू द्वारा कहा जाएगा, वह सुनना विवशता है, यह प्रचारित करना गलत है। अपितु आध्यात्मिकता और अनिवार्यता है कि आज 80 प्रतिशत जनता एक तरफ है, इसलिए बाकी के 20 प्रतिशत की बात ही सुनी जानी चाहिए यह गलत है। जो 80 फीसदी का मत होगा, वह सभी को स्वीकार्य होना चाहिए। चाहे फिर मुद्दा राम मंदिर का हो या समान नागरिक संहिता का। यह कहना है 1992 में कार सेवक बनकर अयोध्या में मौजूद रहे रमन मलिक का। बेशक वे आज बीजेपी के प्रवक्ता हैं, लेकिन वे उनके व्यक्तिगत विचार हैं। अब फिर से वे अयोध्या पहुंच चुके हैं।
रमन मलिक का कहना है कि आज पूरा विश्व जिन चीजों को भुगत रहा है, उसकी चेतावनी बहुत पहले दी जा चुकी है। बात करें हिंदू धर्म की, तो यह जीवन शैली का विषय है। आज तक तो 20 प्रतिशत को खुश करने में लगे थे, 80 प्रतिशत की सुनी ही नहीं गई। सब यह भूल गए कि अगर 80 फीसदी एक हो गए तो देश में कुछ भी कर सकते हैं। कुछ बुद्धीजीवी कहते हैं कि लोकतंत्र की पहचान मतभेद है, लेकिन भूल जाते हैं की लोकतंत्र की आत्मा बहुमत है। वैसे तो देश के हिंदुओं के एक होने पर भी कुछ समुदाय को दिक्कतें हुई। इसको देखते हुए आज कल एक नई प्रथा विकसित हुई है, एक सॉफ्ट हिंदुत्व का ट्रेलर दिखाया जा रहा है। बहुसंख्यक समाज को चाहिए कि वह एक बार विश्वास करें। हालांकि इसको देख, देश की 80 फीसद समाज को तोडऩे के षडयंत्र देश-विदेश में हो रहे हैं। हमें भावनात्मक तरीके से जाति-बिरादरी में बंटे जा रहा है।

इस विषय को मीडिया की मार्फत तेजी से फैलाया जा रहा है। इसलिए जगह-जगह इस तरह के कार्यक्रम और योजनाएं बन रही हैं। पहली बार देश में संतों के आव्हान पर समाज में समरसता लाने के लिए एक प्रयास चला, जिसके अंतर्गत हर जाति बिरादरी को गले लगाने के लिए एक हवन चला है। उसमें एकता तो आई, लेकिन साथ ही तोडऩे के प्रयास भी बराबर हुए। अब प्रश्न यह कोंध रहा है कि बीजेपी-संघ परिवार राम मंदिर का मुद्दा बार बार लाते हैं? इसका भी बड़ा कारण है। वर्ष 1992 से आज 26 साल हो गए हैं। बड़ा आंदोलन 1992 से पहले हुआ, लेकिन इसके बाद में कुछ नहीं हुआ। बकौल रमन मलिक, मुझे याद है मैं उस समय कुछ 18 साल और आठ महीने का रहा हूंगा,। वर्ष 1992 में अयोध्या श्री में था। 26 साल का अंतराल बहुत बड़ा समय होता है। सरकारों, न्यायपालिका को समय दिया गया। सरकारें आती-जाती रही, पर समाधान नहीं हुआ। वर्ष 2010 में निर्णय आने वाला था, उच्च न्यायालय के इलाहाबाद बैंच की तरफ से। ठीक इस से दो दिन पहले स्थानीय प्रशासन वह केंद्र सरकार की ओर से अलर्ट किया गया। लेकिन इस वास्तविकता को नहीं झुठलाया जा सकता की जब निर्णय अपनी इच्छा अनुसार नहीं आया, फिर भी 80 प्रतिशत समाज ने कोई उपद्रव नहीं किया गया क्योंकी न्याय पालिका पर विश्वास था। 24 सितम्बर 2010 का निर्णय सकारत्मक आने की उम्मीद थी। फिर तिथि बदली और यह निर्णय 30 सितम्बर को आया। मेरा मानना है कि यह एक तरह से राजनीतिक निर्णय था। श्रीराम जन्मभूमि जिस भूखंड पर स्तिथ है उसको तीन पक्षों में बांट दिया जाता है, एक हिस्सा श्रीराम जन्मभूमि न्यास को, दूसरा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा वक्फ बोर्ड को दे दिया जाता है।