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राम नाम आधार जिन्हें वो जल में राह बनाते हैं…जिन पर कृपा राम करे वो पत्थर भी तर जाते हैं…

राम नाम आधार जिन्हें वो जल में राह बनाते हैं…जिन पर कृपा राम करे वो पत्थर भी तर जाते हैं…
-सेतु पार करके राम जी की सेना पहुंची लंका 

रिपोर्टर योगेश गुरूग्राम India Now24

गुरुग्राम। जैकमपुरा स्थित श्री दुर्गा रामलीला में लंका जलाए जाने के बाद अंगद लंका में जाकर रावण को अंतिम बार समझाने के लिए जाते हैं। वहां पर उनका रावण के साथ जो संवाद होता है, वह बेहद ही प्रभावशाली होता है। कलाकारों की उम्दा कला यहां नजर आती है। नॉन स्टॉप और एक-दूसरे पर डायलॉग की बौछार सी दोनों तरफ से होती है। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज रावण (बनवारी लाल सैनी) का किरदार देखने को शहर की दूसरी रामलीलाओं से भी लोग पहुंचते हैं।
लीला में दिखाया गया कि हनुमान जी अपनी वानर सेना के साथ श्रीराम जी के पास पहुंचकर लंका में हुई सारी घटना का जिक्र करते हैं। सभी खुश हो जाते हैं कि सीता माता का पता चल गया है। साथ में सीता जी का संदेश कि अगर एक महीने में उन्हें वहां से नहीं ले जाया गया तो वे प्राण त्याग देंगी, इसे सुनकर श्री राम सुग्रीव से मंत्रणा करते हैं कि आखिर किस तरह से युद्ध की तैयारी करके आगे कदम बढ़ाया जाए। इसके बाद की लीला रावण के महल से शुुरु होती है। वे अपनी रानी मंदोदरी के साथ मंत्रणा करते हैं। मंदोदरी कहती हैँ कि मेरी एक बात माने लो और सीता को उन्हें वापस लौटा दो। रावण मंदोदरी से कहते हैं कि कल की घटना से तुम विचलित हो गई हो। और उन्हें तुम तो भगवान समझती हो-

भगवान मानकर भी पगली क्यों बातें करती हो हल्की,
मेरे कारण वो आया है ये महिमा है मेरे बल की।
इसके बाद रावण दरबार में पहुंचकर मंत्रियों से मंत्रणा करते हैं कि आखिर अब आगे क्या किया जाए। क्या नया समाचार है। इसी बीच दरबार में विभीषण प्रवेश करते हुए कहते हैं-हे भ्राता रावण, आपने अपने मंत्रियों की राय तो जान ली है। ये राय सिवाय आपके नाश के कुछ नहीं है। इसलिए मेरी बात मानो और श्री राम से माफी मांगकर सीता उन्हें लौटा दो। गुस्से से लाल रावण कहते हैं-

बैरी के आगे सिर झुकाए ये रावण को मंजूर नहीं,
मिट जाना मंजूर है मुझे पर सीता देना मंजूर नहीं।
इसी बीच रावण विभीषण को लात मारकर लंका से ही निकाल देते हैं। विभीषण वहां से निकलकर रामा दल की ओर चल देते हैं। इसके बाद होती है समुद्र पार करने की तैयारी। समुद्र में पुल बनाने के लिए नल और नील को पत्थर देकर उनके हाथों रखवाए जाते हैं। क्योंकि उनके हाथों से रख गए पत्थर एक श्राप के तहत डूबते नहीं हैं। यहां एक गीत बजाया जाता है-

राम नाम आधार जिन्हें वो जल में राह बनाते हैं, 
जिन पर कृपा राम करके वो पत्थर भी तर जाते हैं। 
कर्तव्य परायण निज भक्तों को सारा श्रेय दिलाते हैं, 
जिन पर कृपा राम करे वो पत्थर भी तर जाते हैं।  

इस तरह से लंका तक पुल बनाकर वानर सेना कूच कर जाती है।
समुद्र पार करने के बाद एक बार शांतिदूत अंगद को रावण के दरबार में भेजा जाता है। वहां रावण-अंगद का संवाद होता है। रावण और अंगद के बीच करीब एक घंटे तक संवाद चलता रहा। फिर अंगद ने रावण के दरबार में पैर जमाते हुए कहा कि जो भी मेरे इस पैर को उठा देगा, श्री राम सीता जी को हार जाएंगें। रावण के कई यौद्धाओं ने प्रयास किया, लेकिन पैर को हिला तक न सके। इसके बाद खुद रावण आए और अंगद का पांव उठाने लगे। अंगद ने पांव पीछे खींककर कहा कि मेरे नहीं जाकर श्री राम के पैर पकड़ो। इसके बाद रावण गुस्से में आ गए। बात न बनती देख अंगद की ओर से युद्ध का ऐलान कर दिया गया, जवाब में रावण ने भी यह ऐलान कर दिया। फिर युद्ध के मैदान पर इंद्रजीत के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। फिर श्री राम लक्ष्मण की मूर्छा तोडऩे के लिए बारे में विभीषण से संवाद करते हैं। विभीषण कहते हैं कि पर्वत पर सुषेन वैद्य राज रहते हैं। वे ही इसके बारे में कुछ उपाय कर सकते हैं। वैद्य जी को लाने के लिए हनुमान जी से राम जी अनुरोध करते हैं। कुछ ही समय में हनुमान जी वैद्य राज को उठाकर ले आते हैं। उनको राम जी सारा वृतांत सुनाते हैं तो वैद्य राज यह कहकर उपचार करने से मना कर देते हैं कि मैं तो लंका का वैद्य हूं और आप लंका के दुश्मन। इसलिए मैं आपके भाई का उपचार नहीं करता। उनके इस कथन पर श्री राम कहते हैं कि धर्म की राह पर चलते हुए अगर भाई की कुर्बानी देनी पड़ी तो वे दे देंगें। इसी बात से प्रभावित होकर वैद्य राज लक्ष्मण का उपचार करने को राजी हो जाते हैं। वैद्य राज बताते हैं कि आज रात ही रात में द्रोणगिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लाई जा सकती है तो लक्ष्मण के प्राण बच सकते हैं। श्री राम हनुमान को ही इस काम के बारे में अनुरोध करते हुए कहते हैं-

ओ बलबीरा बेगी बूटी तो जइयो लाय,
समय-समय पर राम की धरी तुम्ही ने धीर।
इसके बाद हनुमान जी श्री राम का आशीर्वाद लेकर जाते हैं और बूटी लेकर आते हैं। द्रोणगिरी पर्वत से वैद्य राज ने संजीवनी बूटी लक्ष्मण को सुंघाई और उनकी मूर्छा टूट गई। उठते ही लक्ष्मण ने अपने दुश्मन को ललकारा। राम ने उन्हें गले लगाकर विलाप किया।