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ब्यूरो रिपोर्ट गाज़ीपुर।

आज दिनांक।27/12/025को

दारू से नहीं, दूध से करें नए वर्ष की शुरुआत,सनातन संस्कारों के साथ नई पीढ़ी के नाम मार्मिक संदेश

सर्वानंद सिंह झुन्ना, वरिष्ठ समाजसेवी एवं ग्राम प्रधान प्रतिनिधि अलीपुर मदंरा, गाज़ीपुर।

नववर्ष केवल तिथि और कैलेंडर बदलने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और नए संकल्प का पावन अवसर होता है। सनातन संस्कृति में हर शुभ कार्य की शुरुआत शुद्धता और सात्विकता से करने की परंपरा रही है, लेकिन आज के समय में नई पीढ़ी का एक वर्ग नए साल का स्वागत नशा, दारू और दिखावे से करता नजर आता है, जो हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भटकाव का संकेत है।

शास्त्रों में कहा गया है—“यथा अन्नं तथा मनः”अर्थात जैसा आहार होगा, वैसा ही विचार होगा।दूध, जो भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है, शुद्धता, पोषण और सात्विक जीवन का प्रतीक है। वहीं दारू तामसिक प्रवृत्ति को बढ़ाकर विवेक, संस्कार और स्वास्थ्य—तीनों को नष्ट करती है।प्रबुद्धजन मानते हैं कि,नए वर्ष की शुरुआत अगर मदिरा से होगी, तो अंत ग्लानि और पश्चाताप से होगा,लेकिन यदि शुरुआत दूध, संयम और सद्भाव से की जाए, तो जीवन में आरोग्य, शांति और सफलता स्वतः आती है।भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि उत्सव का अर्थ उन्माद नहीं,आनंद का अर्थ नशा नहीं,और आधुनिकता का अर्थ संस्कारों का त्याग नहीं।नववर्ष के इस पावन क्षण पर युवा पीढ़ी को यह संकल्प लेना चाहिए—> “हम नशे के जाम नहीं,संस्कारों का अमृत पिएँगे।होश नहीं खोएँगे,देश और धर्म के लिए हौसले जिएँगे।”यही सच्चे अर्थों में नववर्ष का स्वागत होगा—जो माता-पिता के संस्कारों, गुरुजनों की सीख और सनातन संस्कृति की मर्यादा को जीवित रखेगा।

नया साल नशे से नहीं, निश्चय से शुरू करें,दारू से नहीं, दूध से नए वर्ष की शुरुआत करें।

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