लखनऊ विधायकों की ट्रेनिंग के लिए तैयार किया जाए सिलेबस”, पीठासीन अधिकारियों ने जवाबदेही पर किया मंथन

लखनऊ विधायकों की ट्रेनिंग के लिए तैयार किया जाए सिलेबस”, पीठासीन अधिकारियों ने जवाबदेही पर किया मंथन
राजधानी लखनऊ स्थित विधान भवन में विभिन्न राज्यों से आए पीठासीन अधिकारियों ने विधायिका की जवाबदेही पर मंथन किया और खुलकर अपने विचार रखे। लखनऊ में अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों और सचिवों का सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है।
अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों और सचिवों के 86वें सम्मेलन के दूसरे दिन विधायिका की जवाबदेही पर मंथन हुआ। विधानसभा मंडप में आयोजित सम्मेलन में विभिन्न राज्यों से आए विधानसभा अध्यक्षों ने विधायकों के लिए एक सिलबेस तैयार किए जाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। विधायिका को लोकतंत्र की आत्मा बताया।गुजरात के विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए शिक्षित, प्रशिक्षित और सक्षम जनप्रतिनिधियों का होना अत्यंत आवश्यक है। आज विधायक की भूमिका केवल सदन तक सीमित नहीं रह गई है। उन्हें कानून निर्माण, बजट पर विचार, क्षेत्रीय विकास, जनसंपर्क, प्रशासनिक समन्वय और पार्टी संवाद जैसे अनेक दायित्व निभाने होते हैं। ऐसे में उनके लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। इसके लिए एक सिलबेस तैयार किया जाना चाहिए।
चौधरी ने कहा कि गुजरात विधानसभा में हमने विधायकों के लिए विधायी ड्राफ्टिंग, बजट प्रक्रिया, साइबर सुरक्षा और डिजिटल कार्यप्रणाली पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए। बजट में उनके अच्छे सुझावों पर अमल सुनिश्चित किया। इससे सदन के कार्य की गुणवत्ता और प्रभाव में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। विधायकों के स्वास्थ्य परीक्षण, योग और ध्यान जैसे प्रयोग भी किए गए, जिनके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।आपसी सहयोग और सौहार्द बढ़ाने के लिए विधायक क्रिकेट लीग और सामूहिक आयोजनों जैसे प्रयास किए गए, जिससे विधायकों, मंत्रियों और अधिकारियों के बीच समन्वय मजबूत हुआ। डिजिटल नवाचार के तहत पेपरलेस विधानसभा, ऑनलाइन प्रश्नोत्तर और डाटा आधारित बजट तैयारी ने कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी और जनोन्मुख बनाया है। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सशक्त, प्रशिक्षित और मूल्यनिष्ठ जनप्रतिनिधि अत्यंत आवश्यक हैं। सशक्त विधायक ही सशक्त लोकतंत्र की नींव हैं।
संवाद से सशक्त होता है लोकतंत्र : अब्दुल रहीम राथर
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने कहा कि लोकतंत्र का मूल आधार जनता के प्रति विधायकों की जवाबदेही है। जनप्रतिनिधि सत्ता के स्वामी नहीं, बल्कि संविधान और जनता के सेवक हैं। महाभारत और इस्लामी शिक्षाएं, दोनों न्याय, लोककल्याण और परामर्श पर बल देती हैं। विधानमंडल में हमारा अधिकार पद से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से प्राप्त होता है। कानून निर्माण, कार्यपालिका की निगरानी और गरिमापूर्ण बहस के माध्यम से जनहित की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। लोकतंत्र संवाद से सशक्त होता है, अव्यवस्था से नहीं।अल्पसंख्यकों के अधिकारों की हो रक्षा : कुलतार सिंहपंजाब के विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां ने कहा कि हम महाराजा रंजीत सिंह की धरती से आते हैं, जिनके राज में कभी धर्म के नाम पर झगड़ा-फसाद नहीं हुआ। उन्होंने दिल्ली विधानसभा में हाल ही में आए एक विवादित बयान पर कहा कि अगर सदन के अंदर कोई सौहार्द बिगाड़ने वाला बयान आता है तो उसे कार्रवाई से निकाल देना चाहिए न कि बाहर आकर उस पर बयान देना चाहिए। कुलतार सिंह जब बोल रहे थे तो बीच में टोकाटाकी होने लगी, इस पर डायस पर बैठे यूपी विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना ने कहा कि किसी एक के बोलने पर दूसरे को नहीं बोलना चाहिए।कुलतार सिंह संधवा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि विधायिका लोकतंत्र की आत्मा है। जनप्रतिनिधियों को एक दूसरे के चरित्र हनन से बचना चाहिए। लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों, दलितों और गरीबों के हितों की रक्षा होनी चाहिए। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हालात हम सब देख रहे हैं।
विधानमंडल के जरिये सामने आती हैं जनभावनाएं : हरविंदर कल्याण
हरियाणा के विधानसभाध्यक्ष हरविंदर कल्याण ने कहा कि विधानमंडलों के अध्यक्षों को यह महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त हुआ है कि वे विधायी संस्थाओं को और अधिक प्रभावी तथा सशक्त बनाने की दिशा में विचार-विमर्श करें। विधानमंडल वह संस्था है, जहां जनता की भावनाएं, आशाएं और आकांक्षाएं उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं। ये संस्थाएं जनता के हित में कार्य करती हैं और जनता के प्रति उत्तरदायित्व निभाना इन संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की सामूहिक जिम्मेदारी है।उन्होंने कहा कि प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थायी समितियां और वित्तीय नियंत्रण—ये सभी उपकरण तभी प्रभावी होते हैं, जब उनके पीछे संवैधानिक दृष्टि, जनता के प्रति संवेदनशीलता और संस्थागत क्षमता मौजूद हो। कल्याण ने कहा कि इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए, हरियाणा विधानसभा में अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग कार्यक्रम, विधायी ड्राफ्टिंग पर कार्यशालाएं, विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम, राजनीतिक शोध एवं नॉलेज सेंटर की स्थापना, युवा संसद कार्यक्रम और पत्रकारों के लिए कार्यशालाएं आयोजित की गईं। डॉ. भीमराव आंबेडकर कहते थे कि सदन की प्रतिष्ठा और उसकी शक्ति ही प्रशासन की वैधता को सुनिश्चित करती है, ताकि हिंसा और बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता समाप्त हो सके।
हमें मिली शक्ति जनता की धरोहर : वासुदेव देवनानी
राजस्थान के विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक माध्यम है और इसकी भावना हमेशा युग की भावना बनी रहनी चाहिए। विधायिका की जवाबदेही इसी युग की भावना को समझने और उसे कानून के रूप में ढालने में निहित है। हमें यह समझना होगा कि संवैधानिक नैतिकता केवल कागजों पर अंकित शब्द नहीं हैं, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के विधायी कार्यों का हिस्सा होनी चाहिए। जब हम सदन में बैठते हैं, तो हमें संविधान के ट्रस्टी के रूप में व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि हमारे हाथ में जो शक्ति है, वह जनता द्वारा दी गई पवित्र धरोहर है।अध्यक्ष की निष्पक्ष भूमिका लोकतंत्र की रक्षक : डॉ. गणेश गांवकरगोवा विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. गणेश गांवकर कार्यपालिका पर प्रभावी निगरानी उत्तरदायी शासन की अनिवार्य आधारशिला है। प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, समितियां और बजटीय समीक्षा केवल प्रक्रियाएं नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के संवैधानिक साधन हैं। सदन की गरिमा, अनुशासन और पीठ के प्रति सम्मान लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखते हैं। डिजिटल युग में नागरिकों, विशेषकर युवाओं की बढ़ती भागीदारी लोकतंत्र को सशक्त करने का अवसर है। गोवा जैसे छोटे राज्य में विधायी जवाबदेही अधिक संवेदनशील और जन-केंद्रित हो जाती है। अध्यक्ष की निष्पक्ष भूमिका लोकतांत्रिक संतुलन की रक्षक है। जैसा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि लोकतंत्र एक नैतिक प्रतिबद्धता है। उड़ीसा की विधानसभा अध्य़क्ष सुरमा पाधी कि लोकतंत्र में जवाबदेही बहुत महत्वपूर्ण है। यह आम लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। असम विधानसभा के अध्यक्ष बिस्वजीत दैमारी ने भी लोकतंत्र में विधायिका के महत्व पर विचार रखे



