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क्या भारत में ऐसा हो सकता है

क्या भारत में ऐसा हो सकता है

​भारत में वर्तमान में ‘समान स्कूल प्रणाली’ (Common School System) की मांग कई दशकों से हो रही है (कोठारी आयोग 1964 ने इसकी सिफारिश की थी)। हालांकि, व्यावहारिक रूप से यह कठिन है क्योंकि:

संविधान: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने की आजादी देता है।

​आर्थिक दबाव: भारत में सरकारी स्कूलों का बुनियादी ढांचा अभी इतना मजबूत नहीं है कि वे अचानक करोड़ों निजी स्कूली बच्चों का बोझ उठा सकें।

​कानून: भारत में RTE (शिक्षा का अधिकार) के तहत 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए निजी स्कूलों में आरक्षित हैं, जो एक बीच का रास्ता है।

​भारत सरकार फिलहाल निजी स्कूलों को बंद करने के बजाय, सरकारी स्कूलों को ‘PM SHRI’ योजना के तहत आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रही है।

​* शिक्षा जगत में महा-विस्फोट! नेपाल का ऐतिहासिक कदम: क्या अब खत्म होगी अमीर-गरीब की खाई?*

​काठमांडू/नई दिल्ली:

पड़ोसी देश नेपाल से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के शिक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। नेपाल सरकार ने शिक्षा के बाजारीकरण पर लगाम कसने के लिए एक कड़ा रुख अपनाया है।
​मुख्य बातें:

​पब्लिक ट्रस्ट में बदलेंगे स्कूल: नए कानून के तहत अब निजी स्कूलों को कंपनी (मुनाफे) के बजाय ‘पब्लिक ट्रस्ट’ (सेवा) के रूप में चलना होगा।

​एक समान शिक्षा का सपना: इस कदम का मुख्य उद्देश्य ‘अमीर का बच्चा प्राइवेट में और गरीब का सरकारी में’ वाली व्यवस्था को खत्म करना है।

​विदेशी नामों पर बैन: नेपाल ने स्कूलों के विदेशी नामों (जैसे- ऑक्सफोर्ड, स्टैनफोर्ड) को हटाकर स्थानीय नाम रखने का भी आदेश दिया है।

​राजनीति मुक्त परिसर: स्कूलों और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है।
​भारत के लिए संदेश:
सोशल मीडिया पर अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या भारत को भी इसी तर्ज पर ‘समान स्कूल प्रणाली’ लागू करनी चाहिए? जहाँ कलेक्टर का बेटा और एक मजदूर का बेटा एक ही डेस्क पर बैठकर पढ़ाई करें।

नेपाल में निजी स्कूल आज से बंद नहीं हुए हैं, बल्कि उन्हें अगले कुछ वर्षों के भीतर अपनी कानूनी संरचना (Company से Trust में) बदलने का समय दिया गया है। वे चलते रहेंगे, लेकिन अब वे मुनाफा कमाने वाली ‘फैक्ट्री’ नहीं, बल्कि ‘सेवा संस्थान’ कहलाएंगे।

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