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भारतीय महिलाओं के खिलाफ किए जा रहे साइबर अपराधों की सूची इस प्रकार है

भारतीय महिलाओं के खिलाफ किए जा रहे साइबर अपराधों की सूची इस प्रकार है
1- ट्रोलिंग
2- ई-मेल के माध्यम से उत्पीड़न
3- साइबर स्टॉकिंग
4-साइबर पोर्नोग्राफी
5-मानहानि
6-मॉर्फिंग
7- जाली ईमेल

निम्न अपराधों पर एक संक्षिप्त चर्चा:-
ट्रोलिंग
यह एक गर्म, तर्क या कुतर्क आधारित बहस शुरू करके इंटरनेट पर असहमति जताने का एक तरीका है, जो लोगों को ऑन-लाइन प्लेटफार्म के माध्यम से सोशल मीडिया पर एक भड़काऊ संदेश प्रकाशित करके परेशान करता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का दुरुपयोग करके ट्रोलिंग करना। ट्रोलर एक ऐसा व्यक्ति है जो इंटरनेट पर नफरत फैलाता है। ट्रोलर लोगों को उत्तेजित करने के इरादे से या उन्हें नीचा दिखाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फोरम का इस्तेमाल करता है। परेशान करने की प्रतिक्रिया में ट्रोलर एक ऐसा पेशेवर दुश्मन है जो सोशल मीडिया पर जाली आईडी बनाकर साइबर स्पेस में शीत युद्ध का माहौल बना देता है।


आईO टीO अधिनियम 2000 का प्रावधान सीधे ट्रोलिंग की घटनाओं से संबंधित नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 में संचार सेवा आदि के माध्यम से अपमानजनक संदेश भेजने की सज़ा दी गई है। इस खंड के अनुसार अगर कोई कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण से कोई आपत्तिजनक या परेशान करने वाला मैसेज भेजता है तो उसे तीन साल की अवधि के लिए दंड दिया जाएगा। आईटी अधिनियम, 2000 का यह भाग पीछा करने, फ़िशिंग और स्पैमिंग की घटनाओं को कम करने के लिए डाला गया था। खंड में प्रयुक्त झुंझलाहट और असुविधा शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है।
तथापि 2013 में संशोधन अधिनियम के अनुसार भारतीय दंड संहिता (आई०पी०सी०) की धारा 354 के उपखंड 4 में कहा गया है कि यदि कोई टिप्पणी करेगा तो उसके लिए यौन उत्पीड़न के अपराध पर दंड दिया जाएगा। जिसमें दंड एक वर्ष तक हो सकता है या जुर्माना या दोनों। आई०पी०सी० के तहत यह अपराध संज्ञेय लेकिन ज़मानती है।
ट्रोलिंग की वजह से अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तो उसे आई०पी०सी की धारा 306 के तहत दंड दिया जाएगा। जो कि एक गैरज़मानती अपराध है।
इन दिनों ट्रोलिंग एक मनोरंजन का ज़रिया बन चुका है। आम लड़कियों और औरतों का तो ज़िक्र बाद में आता है, लोग जानी मानी हस्तियों तक को अब उस कगार पर लाकर खड़ा कर देते हैं जहां से उनको भी सोशल मीडिया छोड़ने पर मज़बूर होना पड़ रहा है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि बहुत से सिनेमा कलाकारों को इस ट्रोलिंग नुमा प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है।

साइबर स्टॉकिंग
साइबर स्टॉकिंग का अपराध किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा किसी व्यक्ति की निगरानी करना है और महिलाएं इसकी हिट सूची पर हैं। एक साइबर स्टॉकर खुद को सीधे शिकार के खतरे या दुरुपयोग में संलग्न नहीं करता है। इस तरह के अपराधी, लक्षित व्यक्ति की ऑनलाइन गतिविधियों का अनुसरण भी किया करते है ताकि उसको विभिन्न प्रकार की मौखिक धमकी दी जा सके। ऑनलाइन संचार की गोपनीयता से पहचान का अवसर कम होता है तथा साइबर दुनिया में पीछा करने के उद्देश्य को चार कारणों में विभाजित किया जाता है।
यौन उत्पीड़न, प्रेम जुनून, बदला, घृणा और अहंकार के लिए वर्ष 2008 में संशोधित आईOटीO अधिनियम 2000 के प्रावधान, प्रत्यक्ष रूप से पीछा करने के अपराध के बारे में नहीं बताते हैं। साइबर धोखाधड़ी के अपराध से निपटने के लिए कथित अधिनियम के कुछ प्रावधान निम्नानुसार हैं-
धारा 72, इस धारा के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो इस अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों या विनियमों के तहत प्रदत्त शक्तियों में से किसी के अनुसरण में किसी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पुस्तक रजिस्टर, पत्राचार, सूचना दस्तावेज या अन्य सामग्री पर सुरक्षित पहुँच के रूप में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का खुलासा करता है, उसे दो वर्ष की अवधि के लिए कारावास के साथ दंडित किया जाएगा या जुर्माने के साथ जो एक लाख रुपये या इसके साथ भी लागू हो सकता है।
धारा 67, यह खंड तीन वर्ष तक की कारावास की सज़ा देता है यदि अपराधी पहली बार गलती करता है, लेकिन अगर दूसरी बार गलती करता है तो उसे पांच साल तक की सज़ा दी जा सकती है।
धारा 67 क, इस उपबंध में एक विशेष श्रेणी का पदार्थ है जिसे यौन रूप से स्पष्ट अधिनियम कहा गया है। इस प्रकार की सामग्री के संचारण या प्रकाशन पर पहली बार में पांच वर्ष तक के कारावास तथा दूसरी बार में सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का दंड दिया जाता है।
साइबर पोर्नोग्राफी
भारत की महिला नागरिक के लिए अगला खतरा साइबर पोर्नोग्राफी है। इसमें कंप्यूटर और इंटरनेट की सहायता से साइबर स्पेस में अश्लील सामग्री के प्रकाशन और वितरण को शामिल किया गया है। हम “साइबर पोर्नोग्राफी” को परिभाषित कर सकते हैं जो कि साइबर जगत में अश्लील सामग्री प्रकाशित और वितरित करने के लिए अभिकल्पित हैं। भारत में, पोर्नोग्राफी देखना कोई अपराध नहीं है, बल्कि ऐसी सामग्री बनाना और फैलाना एक अपराध है। इस प्रकार की आपराधिक गतिविधियों में महिलाओं को यह जानकारी भी नहीं है कि अनैतिक चित्रों के प्रकाशन का शिकार उन्हें किया जा रहा है। इस लेख में दी गई महिलाओं के विरुद्ध अन्य साइबर क्राइम्स के विपरीत, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 ने साइबर पोर्नोग्राफी को गंभीर अपराध माना है। अपराधी को आईपीसी के अन्य प्रावधानों के साथ आईटी अधिनियम 2000 की धारा 67 के अधीन दंडित किया जा सकता है। आई पी सी सी की धारा 292, 293, 294, 509 के अतिरिक़्त अश्लील पुस्तकों की बिक्री, अश्लील वस्तुओं को बेचना, अश्लील विषयों का मुद्रण या प्रकाशन करना, अश्लील गीतों को लिखना और महिलाओं की शालीनता को अपमानित करना प्रतिबंधित है।
साइबर मानहानि
साइबर मानहानि एक नई अवधारणा है। मानहानि शब्द की परंपरागत परिभाषा साइबर मानहानि शब्द पर भी लागू होती है, क्योंकि इसमें किसी व्यक्ति की मानहानि, वर्चुअल माध्यम से होती है। सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह एक तीसरे व्यक्ति की नज़र में एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा में हुई क्षति है।
मॉर्फिंग
अनधिकृत उपयोगकर्ता द्वारा मूल तस्वीर को संपादित करने का कार्य है। एक रिपोर्ट के अनुसार महिला के चित्र, नकली प्रयोक्ताओं द्वारा अपने सोशल मीडिया अकाउंट से डाउनलोड किए जाते हैं और इन्हें संपादित करने के बाद विभिन्न वेबसाइट पर अपलोड किया जाता है। उल्लंघनकर्ता को भी आई०पी०सी० के अंतर्गत दंड दिया जा सकता है। अक्तूबर के महीने में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार ब्यूटीशियन ने दिल्ली पुलिस को सूचित किया कि उनकी तस्वीर सेल फोन नंबर के साथ एक अश्लील साइट पर प्रदर्शित की गई थी।
ई-मेल स्पूफिंग
ई-मेल स्पूफिंग ऑनलाइन घोटाले की एक विधि है। अपराधी को धोखा देने वाले ई-मेल में इस तरह की संपत्तियों को इस प्रकार बदलें कि वह ई-मेल, ज्ञात स्रोत से भेजे जाने वाले ईमेल को धोखा दे सके। अपराधी द्वारा ई-मेल के विशिष्ट भागों में ऐसा परिवर्तन होने पर ई-मेल वास्तविक उपयोगकर्ता का नहीं बल्कि किसी अन्य का हो जाता है। अफवाह फैलाने के उद्देश्य से बनाई गई स्पूफिंग की क्रिया, बैंकिंग जानकारी निकालने के लिए किसी एक खाते तक पहुँच जाना आदि ई-मेल स्पूफ़िंग में आता है।
महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों में वृद्धि के कारण
साइबर अपराधों की विभिन्न श्रेणियों की चर्चा के बाद अब हम साइबर स्पेस में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि के कारणों की जांच करेंगे। समाज के विकास के साथ अपराध भी बढ़ रहे हैं। महिलाओं को साइबर स्पेस में आसानी से निशाना बनाया जाता है।
इस तरह के अपराधों के पीछे के कारण इस प्रकार हैं-
आधिकारिता मसला:
साइबर स्पेस का इंटरनेट पर अधिकारिता का पता लगाने के लिए साइबर स्पेस की सीमा कम होती है। यह साइबर अपराध की बढ़ती दर के कारणों में से एक है। अधिकारिता की समस्या तब उत्पन्न होती है जब एक स्थान पर अपराध किया जाता है और व्यक्ति को दूसरे स्थान पर प्रभावित करता है और मामले को दूसरे स्थान पर पंजीकृत किया जाता है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि अधिकांश आपराधिक मामलों में न्याय क्षेत्र का मुद्दा आपराधिक प्रक्रिया संहिता लागू कर हल किया जाता है लेकिन आई०टी० अधिनियम 2000 की अक्षमता, अधिकारिता संबंधी मामले पर साइबर अपराधों में वृद्धि के पीछे कारण है। अधिनियम की धारा 75 में विशेष रूप से भारत के बाहर किए गए साइबर अपराध की घटनाओं का उल्लेख किया गया है परंतु यह अधिकारिता के मुद्दे पर मौन है। केवल तीन वर्गों यानी धारा 66, 67 और 72 ए ने साइबर अपराधों के बारे में चर्चा की है। ट्रोलिंग, हैकिंग, इमेल उत्पीड़न, मार्फिंग, साइबर स्टॉकिंग, इमेल स्पूफिंग आदि के द्वारा किये गये उल्लंघन का इसमें सीधे प्रावधान नहीं हैं।
हम भारतीय अपने पारिवारिक मूल्य और सम्मान में विश्वास करते हैं। वे समाज द्वारा उन्हें और उनके परिवार को दिए गए सम्मान को महत्व देते हैं। यही कारण है कि स्त्रियों के विरुद्ध अपराध के अनेक अपराध अपंजीकृत होते हैं। पीड़ित की झिझक या शर्म और समाज की नजर में अपने परिवार को बदनाम करने का डर उसे विभिन्न महिलाओं के विरुद्ध बार-बार अपराध करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
अज्ञात अपराधः
इंटरनेट पर अपराध करने वाले की गुप्त पहचान महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध का एक कारण है। वे साइबर स्पेस में अलग अलग नाम और पहचान द्वारा महिलाओं को बार-बार परेशान तथा ब्लैकमेल करते हैं। समाज की यह मान्यता कि पीड़ित स्वयं अपराध के लिए जिम्मेदार है, यही कारण है कि पीड़िता पुलिस के पास नहीं जाती। ऐसे अपराधों के खिलाफ पुलिस तक पहुंचने में भारतीय महिलाओं की हिचकिचाहट चाहे वे साइबर दुनिया में हो या असली दुनिया में, अपराधी को प्रोत्साहित करती है। वे ऐसे अपराधों के खिलाफ चुप रहना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके पारिवारिक जीवन में गड़बड़ी पैदा हो सकती है और उन्हें समाज की आंखों में गिरना पड़ सकता है।
उपाय एवं रोकथाम:-
महिलाओं के खिलाफ साइबर क्राइम को निम्नलिखित सावधानी के कदमों द्वारा कम किया जा सकता है:
1-सरकार को यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति डाटा पैक डलवाता है तो उसको मैसेज के द्वारा आई० टी० एक्ट की धारा 66, 67, एवं 72 व आई०पी० सी० और सी आर पी सी में दिए गए दंडों का संछिप्त वर्णन करके उसे इस बाबत जानकारी दी जाए ताकि व्यक्ति विशेष खुद भी कोई ऐसा कदम उठाने से पहले दो बार सोचे।
2-सरकार के द्वारा यह निर्देश दिए जाने चाहिए कि ‘सोशल मीडिया’ के नाम से एक विषय, चौथी और पांचवी कक्षा में अनिवार्य कर दिया जाए। साथ ही साथ सोशल मीडिया के बारे में अच्छे और बुरे पक्ष तथा साइबर क्राइम और साइबर सिक्योरिटी के बारे में भी पढ़ाया जाए।
3-नुक्कड़-नाटक आज जागरूकता फैलाने का एक नायाब तरीका है। सरकार को चाहिए कि दिल्ली में जगह जगह पर नुक्कड़ नाटक आयोजित करवा कर औरतों को साइबर अपराधों के बारे में जागरूक किया जाए और उन्हें विशवास दिलाया जाए कि दोषी को शर्मिंदा होने की ज़रूरत है पीड़िता को नही।
4-सरकार को चाहिए की संचार के विभिन्न माध्यमों के द्वारा प्रदेश की जनता को जागरूक किया जाए और एक निश्चित समय के अंतराल पर साइबर अपराध की पीड़िताओं के संघर्ष एवं हिम्मत की कहानियों को प्रकाशित किया जाए ताकि अन्य महिलाओं को इस बात का भरोसा हो कि कानून उनके खिलाफ हो रहे अपराधों में उनके साथ एवं पक्ष में है।
5-जैसा कि हम जानते है कि आई०टी० एक्ट मुख्य रूप से व्यापार एवं ई-कॉमर्स आदि के लिए बना था जिस कारण जो साइबर अपराध है वो मुख्यता आई पी सी और सी०आर० पी० सी से सम्बंध रखता है परंतु आई०टी०एक्ट का इस बाबत योगदान काफी कम है। आई०टी०एक्ट में हम विभिन्न अपराधों एवं उनके दंडों को आई०टी० एक्ट में संशोधित करके जोड़ सकते है।
6- हाल ही में जिस तरह माननीय मद्रास उच्च न्यायालय ने पुलिस को ये निर्देशित किया है कि विशिष्ट प्रकोष्ठों के माध्यम से सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुत्शित भाषा का प्रयोग न किया जाए, इसी तर्ज़ पर दिल्ली सरकार को महिलाओं के लिए विशिष्ट कदम उठाने चाहिए।
7- सरकार को चाहिए कि प्रदेश में चल रहे रजिस्टर्ड NGOs, स्वयं सेवी ससंस्थाओ को निर्देशित करे कि वे लोग समय-समय पर महिलाओं के बीच जाकर साइबर अपराध एवं उसके दंडों के बारे में महिलाओं को जागरूक करें।
8- राज्यों में समय-समय पर ऐसे कार्यक्रमो का आयोजन हो जिसमें लोगों की हिस्सेदारी से लोगों के खुद के ज्ञान में वृद्धि हो एवं वो अपनी माताओं और बहनों को भी जागरूक कर सके। क्योंकि जागरूकता ही इसका सबसे बड़ा उपाय है।
महिलाओं द्वारा साइबर अपराध से बचने के लिये उठाये जाने वाले निजी कदम:-
भारत उन कुछ देशों में से एक है, जिसने साइबर अपराधों की घटनाओं को कम करने के लिए कानून पारित किया है। लेकिन इस कानून का उद्देश्य था केवल व्यापारिक और आर्थिक अपराध। कोई प्रत्यक्ष प्रावधान नहीं है जो विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा तथा साइबर स्पेस में महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों के बारे में अधिनियम से संबंधित हो। महिलाओं के खिलाफ साइबर क्राइम को निम्नलिखित सावधानी के कदमों के द्वारा कम किया जा सकता है:
1-किसी को साइबर स्पेस में अज्ञात लोगों के साथ चैट नहीं करना चाहिए
2-पासवर्ड हमेशा बदलते रहना चाहिए।
3-कंप्यूटर पर निजी और महत्वपूर्ण चीजों को सेव नहीं करना चाहिए क्योंकि हैकर उसे हैक कर सकता है।
4- यदि कुछ गलत प्रतीत होता है तो बिना किसी संकोच के कानून प्रवर्तन एजेंसियों को तुरंत संपर्क किया जाना चाहिए।
5- महिलाओं को जल्द से जल्द साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करानी चाहिए ताकि अपराधियों को बच निकलने का मौका न मिले।

ताहिरउज़्ज़मा 

अनुभव वशिष्ठ