Breaking News आर्टिकल

नवजात शिशु की देखभाल

नवजात शिशु की देखभाल

प्रसव काल में नवजात शिशु माता के गर्भाशय से बाहर आते ही नवजात शिशु की परिचर्या आरंभ हो जाती है। जन्म लेने के बाद के प्रारंभिक कुछ पल शिशु के लिए महत्पूर्ण होते हैं। नवजात
शिशु के शरीर की सफाई, प्राण वायु का संचार तथा नाभिनालोछोदन तत्काल प्रभाव से किया जाने वाला कारक है। प्रसव के पश्चात् शिशु एक नए माहौल में प्रवेश करता है तथा जीवनरक्षा प्रक्रियाएं अब शिशु को स्वयं करनी होती है तथा इस समय उसे सम्पूर्ण देखभाल की आवश्यकता होती हैं। नवजात शिशु को नए माहौल में अपने आपको निम्न प्रकार से अभियोजन करना पड़ता है-
१. तापमान के परिवर्तन के प्रति अभियोजन
२. श्वास प्राणवायु के प्रति अभियोजन
३. चूसने एवं निगलने के प्रति अभियोजन
४. उत्सर्जन की क्रिया के प्रति अभियोजन

शिशु कुदरत की सबसे बड़ी देन है। शिशु माता की कोख में ९ महीने तक रहता है। इसमें होते हुए माता के द्वारा उसका पालन पोषण होता है। शिशु को माता की कोख से बाहर आते ही अपने से जीवन की शुरुआत करनी होती है वह अपनी पहली सांस लेता है

माता के अंदर शिशु का तापमान सही रहता है । लेकिन बाहर आते ही तापमान को सही रखना पड़ता है इसलिए उसे तुरन्त पोछकर कपड़े से ढककर रखना चाहिए। उसके शरीर का तापमान ३५-५० सेंटीग्रेट होना चाहिए। तापमान घटने पर बीमार होने की संभावना बन सकती है। उसे कई तरह के इन्फेश्चन हो सकते हैं। जन्म के बाद शुरू के ४-५ दिनों में शिशु का वजन कुछ घटता है तत्पश्चात वह धीरे धीरे बढ़ने लगता है और दसवें दिन तक अपना जन्म वजन प्राप्त कर लेता है। शिशु मां की कोख में होता है तो वहीं से पोषण लेता है, इसलिए बाहर आते ही उसे जल्द से जल्द मां के दूध का सेवन करना चाहिए इससे तुरंत पोषण मिलना शुरू होता है। शिशु को ढाई तीन घंटे पर दूध पिलाना चाहिए तथा उसे कंधे पर रख कर थप्पी देना चाहिए। शिशु जब भी मल मूत्र करता है तो उसे तुरंत साफ कर देना चाहिए। शिशु अगर दूध न पिए, अगर उसके हाथ या पैर ठंडे पड़ने लगे, अगर उसकी पसलियां चलने लगे या बहुत ही सुस्त लगे तब उसे तुरंत किसी बाल चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नवजात संक्रमण तथा जन्म के समय होने वाला श्वासावरोध वैश्विक नवजात मृत्यु के 80% से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं।
प्रीटरम या कम जन्म वजन वाले शिशुओं को विशेष प्रकार के देखभाल की आवश्यकता होती है, जिसमें उन्हें स्तनपान तथा स्वास्थ्य सुविधाओं में गर्म रखना इन बातो का अवश्य ध्यान देना चाहिए।

शीघ्र और उपयुक्त एंटीबायोटिक नवजात संक्रमणों के कारण मृत्यु दर को काफी हद तक कम करने में सहायक हो सकती है

नवजात शिशु के पैदा होने के बाद उसे तुरंत रोना सांस लेना चाहिए। नवजात शिशुओं को विशेष परिस्थिति में अधिक देखभाल की जरूरत होती है। वे निम्न हैं:-
१. जुड़वा बच्चे या कम वजन के बच्चे
२. समय के पूर्व बच्चे का जन्म
३. जहां बच्चे को स्तनपान ना कराया जाता हो
४. जहा पर बच्चे का वजन ३ माह तक ना बड़ रहा हो
५. वजन में कमी
६. शिशु का जन्म २ वर्ष से कम अंतराल पर हुआ हो।

नवजात शिशु को निर्धारित समय पर सभी टीके लगवाना चाहिए। स्तनपान के अलावा उन्हें अतिरिक्त खुराख चाहिए। स्वस्थ माता ही स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती है। माता स्वस्थ होगी तो शिशु स्वस्थ होगा।