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ईसानगर खीरी – स्वतंत्रता संग्राम में ईसानगर के वीर सपूत का त्याग व बलिदान रहेगा हमेशा अविस्मरणीय। – India Now24

ईसानगर -खीरी

स्वतंत्रता संग्राम में ईसानगर के वीर सपूत का त्याग व बलिदान रहेगा हमेशा अविस्मरणीय।

(अनुपम मिश्रा)
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ईसानगर।देश की आजादी की लड़ाई में भारत के स्वन्त्रता संग्राम सेनानियों का त्याग और बलिदान हमेशा अविस्मरणीय रहेगा।इनके त्याग और बलिदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता ।आज मैं एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के बारे में जानकारी देने जा रहा हूँ जिन्होंने भारत की आजादी में अपना सर्वस्व न्योछावर करने के बाद भी हार नहीं मानी।

उत्तर प्रदेश के जनपद लखीमपुर खीरी के कस्बा ईसानगर के वीर सपूत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं• भगौती प्रसाद त्रिपाठी “घाघ”जी का देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान रहा है इनका जन्म 1908 में ईसानगर कस्बे में हुआ था । इन्होंने अंग्रेजी अधिकारी के गाली देने के लिए उसे थप्पड़ रसीद कर दिया था जिसके कारण 1938 में भारत मां के इस वीर सपूत को 3 वर्ष की सजा हुई थी,बरेली केन्द्रीय कारागार में उक्त सजा काटने के बाद भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े और उन्हें पुनः जेल भेज दिया गया और 2 साल की सजा काटने के बाद जेल से रिहा किया गया।

इन्होंने घर परिवार की परवाह किये बिना अनेकों तरह की यातनायें सहन की किन्तु अंग्रेजों से हार नहीं मानी।
यह संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वाराणसी से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। यह एक अच्छे कवि भी थे इन्होंने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध अनेक प्रकार की उत्तेजक रचनाएं भी रची जिसको लेकर इनकी पहचान क्षेत्र में कवि के तौर पर जानी जाने लगी।
इनको 1972 में इन्दिरा गांधी द्वारा ताम्रपत्र भेंट किया गया तथा भारत के कई बार प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी बाजपेयी द्वारा इनके गांव आकर इनसे भेंट की गई व हाल चाल जाना गया।

अंग्रेज अधिकारियों द्वारा उनको अनेक तरह की यातनाएं दी गई ,अंग्रेज अधिकारियों द्वारा इनको तनहाई भी दी गयी ,परेशान करने की हद तो तब हो गयी जब आटा पीसने की घर की चक्की आदि भी अंग्रेजों द्वारा तोड़ दी गयी। तीन बार घर को कुर्क कराया गया कुछ भी नहीं बचा जिससे परिवार वालों को खाने के लाले पड़ गए।

भारत की आजादी के बाद इनको केंद्र व राज्य दोनों सरकारों की तरफ से पेंशन का लाभ दिया जाने लगा जिससे उनके परिवार का भरण पोषण होने लगा।3 दिसंबर सन 2001 में भारत माता का यह वीर सपूत हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो गया ।

इनकी मृत्यु के बाद परिवार का पूरा भार इनके इकलौते पुत्र पं. वरद राज त्रिपाठी के कंधों पर आ गया, इनके परिवार में स्वयं व पत्नी तथा बहिन व पांच पुत्र ,कुल मिलाकर आठ लोगों का भरण पोषण करना इनके लिए चुनौतियों से भरा था। स्वतंत्रता संग्राम के वीर सपूत पं0 भगवती प्रसाद त्रिपाठी “घाघ”की मृत्यु के बाद इनके परिवार वालों की सुधि किसी भी सरकार को नहीं आयी जिसके चलते आज भी इनके परिवार की हालत दयनीय बनी हुई है।

भारत की गणतंत्रता के महान पर्व गणतंत्र दिवस के अवसर पर हमेशा की तरह आज भी सरकारी स्कूलों के बच्चे उनके दरवाजे पर आकर ध्वजारोहण में भाग लेते हैं और इनके परिवार वालों की ओर से स्कूली बच्चों को मिष्ठान का वितरण किया जाता है।

इनके परिवार से संवाद में परिवार के सदस्यों द्वारा बताया गया कि ईसानगर को आने वाले मुख्य मार्ग पर एक
“पं0 भगवती प्रसाद त्रिपाठी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मृति द्वार” का निर्माण कराया जाय ।हम लोगों ने मेहनत मजदूरी करके समाधि तो बनवा दी लेकिन भारत की आजादी में अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले इस ईसानगर के इस वीर सपूत के नाम से एक स्मृति द्वार का निर्माण करना तो सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है उनके नाम से कोई भी निर्माण किसी भी सरकार द्वारा आज तक नहीं किया गया।जिससे हम लोग अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं ऐसा कहते -कहते परिवार वालों की आँख में आंसू तक छलक आते हैं।

आपको बता दें कि यह संस्कृत के प्रकांड विद्वान भी थे इन्होंने वाराणसी से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसके चलते आस-पास व दूर-दराज के लोग भी इनके पास संस्कृत की शिक्षा ग्रहण करने आते थे।अतः भारत माता का यह वीर सपूत शास्त्री होने के नाते संस्कृत का एक ‘महान विद्वान’ , एक अच्छे रचनाकर होने के नाते ‘कवि’ तथा भारत की आजादी में आर- पार की लड़ाई लड़ने व स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने के कारण ‘स्वतंत्रता संग्राम सेनानी’ के रूप में जाने जाते थे।